सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Tuesday, March 24, 2026

बरगद और बाबा


(पंडित जय प्रकाश चतुर्वेदी, पूर्व संगठन मंत्री एवं पूर्व सदस्य विधान परिषद-भारतीय जनता पार्टी)



बाबा की लकीरें 

पैर जब ज़मीन पर पड़ते हैं, तो वे सिर्फ चलते नहीं,
बीते हुए पल की लाचारी को कुचलते हैं। 
खांसी को लगभग चबाते हुए उस व्याकुलता को मिटा देते हैं।
पगथलियों की झुरमुराती रेखाओं में (जो अब बहुत गाढ़ी और गहरी होती जा रही हैं) जमी उसकी उपस्थिति को दूबारा झाड़ने के क्रम में वह उसे बार-बार फर्स का स्पर्श भेंट करते हैं। 
वह जो खाँसी का तूफ़ान अभी गुज़रा है,
उसे उन्होंने पतली कसती हुई हिम्मत से शांत कर दिया है। 
उनके हाथ नहीं काँपते—
क्योंकि उन हाथों में उनके पूरे वजूद की पकड़ और संघर्ष का लेखा-जोखा है।
"मैं ठीक हूँ"
यह शब्द नहीं, एक अभेद्य किला है, और उनका धैर्य उनकी सैन्य शक्ति।
जिसे उन्होंने अपनी कमज़ोरी के चारों तरफ़ खड़ा कर दिया है।
ताकि बाहर खड़े अपनों को,
उनकी ढहती हुई दीवारों की दरारें न दिखें। 
कोई उन दरारों से भीतर झांकता हुआ उनके विश्वास और सजी हुई सफल यात्रा को ना कुरेद सके।
जैसे बरगद अपनी लटकती जटाओं से,
खुद को फिर से ज़मीन में गाड़ लेता है,
बाबा भी अपनी हर गहरी साँस से,
जीवन को एक बार फिर ज़मीन से पकड़ रहे हैं।
उनके लिए ठीक कुछ समय पहले पनपा बलगम का ज्वार अतीत की परछाई है जो उन्हें पीछे खींचती है,
पर उनका 'निर्भिकता' एक प्रकाश पुंज है—
वह उस अंधेरे को चिरते हुए हर बार वर्तमान पर कूद जाते है। 
साहस और आत्मविश्वास के साथ और कहते हैं मैं ठीक हूं।

मानों कूदने से हीं सब ठीक हो जाएगा।



कितनी हिम्मत जुटानी होती है यह कहने में कि मैं ठीक हूं?
अभी तो मैं बेहतर हूं।
वो अभी जो इस समय मौजूद है उसमें कुछ देर पहले की थकान शामिल नहीं हुई है। 
अभी से ठीक पहले खांसी के तेज तूफ़ान ने उन्हें थोड़ा और कमजोर किया था। 
कमजोरी से जन्मे थकान ने उनकी आवाज को और कमजोर किया।
लेकिन अपने ठीले होते जा रहे पजामें को जहां अब बहुत जगह बनती जा रही है..व्यवस्थित करते हुए गहरी सांस अंदर लिया। बाबा ने लंबी सी साँस खींची-और उस एक साँस में बीते पल की उपजी थकान सिमट आई।
सांस की आवाज को अपने पैरों की आवाज से शांत करते हुए। उसे पूरी तरह सूखा देने के बाद उन्होंने फिर दुहराया.. 
अभी तो मैं ठीक हूं। बेहतर हूं पहले से। 
उन्होंने अपने पैरों से उठी धुन में सारी थकान, शारीरिक कष्ट और स्वास्थ्य हानि को झाड़ दिया।
वर्तमान की दृढ़ता ने बीते पलों को मानों धुल दिया हो। 
इस बारंबारता में सिकुड़न लिए धीमा होता वर्तमान अतीत को बहुत पिछे ढ़केलता हुआ आगे बढ़ रहा है।
उनके वर्तमान में वो बिल्कुल ठीक हैं। अपनी मौलिकता में अपने अतीत की परछाई को संयम और धैर्य के प्रकाश से चीरते हुए।

4 comments:

Mrinalini said...

A deeply personal and safe article. How we all view our elders as we age? How are we influenced by them? This is what makes our present beautiful.

Swastik said...

सुंदर और प्रभावशाली रचना।
यह जितना सरल है उतना हीं आत्मिय भी।

Piyush Chaturvedi said...

Thank you Mrinalini, Baba has taught me the most important things in life, the first of which is family.

Piyush Chaturvedi said...

धन्यवाद सात्विक। अकेलापन हमारी मौलिकता को बचाए रखता है या उसे ठहराव के मुहाने पर ला खड़ा करता है।
लेकिन व्यक्ति अपने अकेलेपन में स्वयं से सबसे अधिक प्रश्न करता है। उसी अकेलेपन में अतीत का निवेश प्रबल होता है।

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