सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Saturday, August 29, 2026

पिताजी की हत्या

सुबह का समय। पंछियाँ कलरव कर रही थीं। मंदिर के हर कोने से उठती घंटे की आवाज़ सभी दर्शनार्थियों को श्रद्धा से भर रही थी। रंग-बिरंगे फूल भगवान शिव के चरणों में समर्पित शिवलिंग की शोभा बढ़ा रहे थे। सभी आगंतुक भक्ति-भाव और विश्वास में डूबे भगवान के आगे नतमस्तक थे।
वहीं एक 17 वर्ष का साधारण-सा लड़का था, जो अपने भीतर डर को बसाए, भक्ति का झूठा चोला पहने दो पंडितों के सानिध्य में तेज मंत्रोच्चारण के उद्घोष के बीच शिवलिंग पर कांपते हाथों से पतली धार बनाकर गोरस का अभिषेक कर रहा था। शायद वह अभिषेक कर नहीं रहा था, उससे कराया जा रहा था। उस अभिषेक में सिर्फ गंगाजल और गाय का दूध शामिल नहीं था, उसमें उसके निरंतर बहते आँसू भी शामिल थे जो अब सूखने को आए थे। वे आँसू उसी दूध के साथ बहते जा रहे थे। तेज बजती हर घंटी की आवाज़ उसे भीतर तक भयभीत कर रही थी। इतना डर उस लड़के को कभी नहीं लगा था—शायद उस रोज भी नहीं जब उसके पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और उन्हें लखनऊ के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पर आज वह डर के मकड़जाल में खुद को फँसता हुआ पा रहा था, जहाँ से बाहर निकल पाना एक लंबी लड़ाई को जन्म देने के समान था। वह लड़ाई जो उसे खुद से लड़नी थी। वह लड़ाई जो मुझे लड़नी थी... क्योंकि वह डर मेरा था। वह लड़का मैं था। जिसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी।
1 जनवरी, अंग्रेजी नए साल का पहला दिन। भारत एक ऐसा देश है जहाँ सभी धर्मों का सम्मान होता है। जहाँ ईसाई नए साल को पिकनिक और पार्टी के साथ मनाने वाला हिंदू, हिंदी नववर्ष भी पूजा-पाठ और माँ दुर्गा की आराधना करके मनाता है। कुछ कट्टरपंथी संगठन आज भी अपने तरीके से विरोध करते हैं, लेकिन साफ हृदय और निष्पक्ष व्यवहार वाला व्यक्ति इन सब नाटकों से स्वयं को दूर रखे हुए है। शायद यही हमारे देश का गौरव है जो एकता और अखंडता को बनाए रखता है।
पिताजी भी अपने कुछ मित्रों के साथ गाँव की खूबसूरती में चार चाँद लगाती सोन नदी को पार कर, कैमूर पहाड़ी के करीब कहीं पिकनिक मनाने गए हुए थे। घरवालों ने अपनी तरफ से कड़ाके की ठंड और दूरी का हवाला देकर मना भी किया था। लेकिन जिस गाँव की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर कोई भी व्यक्ति घंटों उसे निहार सकता है, कोई अनजान भी जिससे प्रेम कर सकता है, उस सौंदर्य से मेरे पिताजी खुद को दूर नहीं रख सके। और न ही घरवालों की ज़िद उन्हें रोक सकी। अक्सर हम वैसे काम करना चाहते हैं जिसमें हमारी अंतरात्मा प्रसन्न हो, और उस प्रसन्नता से हम कोई समझौता नहीं करना चाहते। पिताजी ने भी नहीं किया।
भगवान के प्रति अनन्य भक्ति ने उन्हें हमेशा जनमानस के कार्यों से जोड़े रखा। अक्सर नदी पार गुप्त धाम में कीर्तन का आयोजन उन्हें प्रकृति से जोड़े रखता था। अपने साथियों को 'ना' न कह पाने की आदत को वे आज तक अपना गुलाम नहीं बना सके थे। ग्राम प्रधान रहते हुए ग्रामीण स्तर पर बनाए उनके संपर्क आज भी उन्हें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाए हुए थे। इसी क्रम में उनका अपने साथियों के साथ पिकनिक पर जाना एक स्वाभाविक सा कदम था।
तेज ठंड और शीतलहर चादर फैलाए हुए थी। घने पेड़ की छाँव में नए वर्ष की पहली रात जश्न में बीत रही थी। उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध और हर अवसर पर भाने वाला व्यंजन—लिट्टी-चोखा, हरी धनिया की सुगंध लिए सबके पेट की अग्नि शांत कर रहा था। पीने के साफ पानी की उचित व्यवस्था न होने के कारण सभी ने नदी के पानी का उपयोग भोजन पकाने से लेकर पचाने तक में किया।
सुबह की शीतलहर में जब सूरज खुद को बादलों में छिपाए हुए था, मस्त-मलंग हवा खुले वातावरण में आजाद नाचती हुई ठंड को बढ़ा रही थी। धुंध सबकी आँखों की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रही थी, उसी दौरान सभी नदी के ठिठुरते पानी में नाव पकड़ने उतरे। वहाँ तक का सफर तय किया जहाँ तक पानी का बहाव कम था। चलती नाव पर हवा की तेज लहरें सभी की हड्डियों को चीरती हुई मानो आर-पार हो रही थीं। सभी अपने हाथ आपस में रगड़कर गर्म कर रहे थे, लेकिन शरीर को गर्म करने का कोई उपाय नहीं था। जब नाव दूसरे छोर पर लगी, तो पानी का सहारा लेना आवश्यक हो गया। घुटने तक पानी में वापस तय किए सफर ने सभी को ठंड की कँपकँपी का अहसास करा दिया था। इसके बाद सभी अपने-अपने घर के लिए निकल पड़े।
घर पहुँचने तक रास्ते में हल्की मीठी धूप सभी के शरीर को स्पर्श कर चुकी थी। ज्यादा नहीं, पर वह थोड़ी-सी गर्माहट उनकी हड्डियों तक पहुँची ठंड से निजात दिलाने के लिए काफी थी।
पिताजी के घर पहुँचते ही सब आश्चर्य से भर गए। किसी ने भी इतनी सुबह ठंड में उनके आने की उम्मीद नहीं की थी। सभी को दोपहर में धूप खिलने के साथ उनके आने की आशा थी। लेकिन किसी ने भी कुछ बोलना उचित नहीं समझा। पिताजी की जल्दी गुस्सा हो जाने की आदत भी शायद इसका कारण थी। सभी ने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया। दोपहर को भोजन करने के बाद उन्होंने अच्छी नींद ली। शायद थकान अपना काम ईमानदारी से कर रही थी, क्योंकि थकान के जाते ही नींद ने धोखा देना शुरू कर दिया। रात में जब थकान मिट चुकी थी, तब अनवरत कोशिशों के बाद भी नींद ने उन्हें अकेले ही रहने दिया। आँखों में नींद पूरी तरह जगह बनाए हुए थी, लेकिन देह अपने दर्द को फैलाती जा रही थी। इस कारण पिताजी ने पूरी रात करवटें बदलकर काट दी। माँ के पूछने पर कि "सब ठीक तो है?", पिताजी ने 'हाँ-हाँ' में सिर हिला दिया। पूरे शरीर की अकड़न और दर्द को वे पूरी रात इस उम्मीद में सहते रहे कि सुबह सब ठीक हो जाएगा।
सुबह ने शायद अपनी तैयारी रात में ही कर ली थी, या पिताजी की तैयारी अधूरी रह गई थी—यह समझना मुश्किल नहीं था। परिस्थिति रात से भी बदतर हो चुकी थी। पिताजी का शरीर दर्द से टूट रहा था, जोड़ों का दर्द असहनीय हो चला था। बिस्तर से नीचे उठते कदम उन्हें भीतर से कमजोर कर रहे थे। अचानक माँ की नजर उन पर पड़ी और बिना कुछ कहे माँ ने उनकी तकलीफ समझ ली। भारत में माँएँ बच्चों के प्रति ममता से भरी होती हैं, लेकिन पति के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा होती है जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती, केवल संकेत ही काफी होते हैं। यदि रिश्ता पावन हो, तो तर्क और संवाद की जगह संवेदना जीत जाती है।
माँ की नजर पड़ते ही पिताजी बोल पड़े, "शरीर में बहुत दर्द है, जोड़ों में अकड़न हो रही है।" माँ बिना कुछ कहे रसोई की ओर चल पड़ीं, इस उम्मीद के साथ कि यह ठंड का दर्द है। "जरूर ठंडी लग गई होगी... मैंने कहा था वहाँ न जाने को, लेकिन मेरी सुनता कौन है!"—इतना सब खुद से कहती हुई माँ अपनी ही चिंताओं में घिरती चली गईं। मैंने माँ को पिताजी से हमेशा कम बोलते देखा था, लेकिन वह उनकी चिंता बहुत करती थीं। माँ जब भी चिंतित होती थीं, उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बन जाते थे। एक घरेलू कामकाजी महिला, जो सिर्फ घर संभालती है, वह अपने परिवार के सुख-दुख में तन-मन से शामिल होती है। वह जानती है कि चिंता करने से समस्या का हल नहीं होगा, लेकिन गृहस्थ महिला के कष्ट में होने का प्रमाण और शृंगार दोनों ही 'चिंता' होती है। जिसे देखकर सामने वाला भले चिढ़ जाए, पर महिला तमाम कोशिशों के बाद भी उसे उतार नहीं पाती। उतारे भी कैसे? यह खुद से किया शृंगार नहीं, यह तो प्रेम को कष्ट के बादलों से ढकता देख खुद-ब-खुद घट जाता है—जैसे बादलों के बनने से बारिश होती है।
माँ ने पिताजी के पास जाकर गर्म कपड़े के टुकड़े से कुछ औषधीय पत्तों की मदद से सेकाई करना शुरू किया। पिताजी को हल्का आराम मिल रहा था। राहत से कम होती बेचैनी के बीच पिताजी ने माँ की चिंता को उनकी आँखों के नीचे के काले घेरों में देख लिया। पिताजी गुस्सा करना चाहते थे, लेकिन आराम ने उन्हें रात की अधूरी नींद के करीब खींच लिया।
दोपहर में माँ ने खाना बनाया और पिताजी को भोजन के लिए उठाने गईं। पिताजी ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा, माँ की आँखों के काले घेरे और गहरे हो चुके थे। माँ चिंता के समुद्र में गोते लगा रही थीं—लहरें कभी उन्हें खींचतीं, तो कभी तट पर फेंक देतीं। इस ऊहापोह के बीच माँ ने डॉक्टर को दिखाने की बात कही। हमेशा ज़िद करने वाले पिताजी ने माँ की चिंता को गहरा न करते हुए 'हाँ' में सिर हिला दिया। आँखों का वह काला घेरा उसी समय हल्का हो गया, आँखें सुबह धूप में खिलती कली के समान खिल गईं।
रात में कोई खास आराम नहीं मिला। सेकाई और गर्म पट्टी की मदद से ठंड की लंबी रात को और लंबा न होने देने की नाकाम कोशिश में माँ ने पूरी रात बिता दी। सुबह पिताजी और माँ दोनों रेणुकूट स्थित कंपनी के निजी अस्पताल में डॉक्टर के पास पहुँचे। डॉक्टर ने सभी उचित जाँच कराने की सलाह दी और रिपोर्ट के साथ वापस बुलाया। जाँच के बाद डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी और कहा, "सब कुछ ठीक है, बस ESR बढ़ा हुआ है जो पानी के इंफेक्शन से बढ़ जाता है।" उन्होंने MRI कराने की सलाह देकर घर जाने को कह दिया। "कोई खतरे की बात नहीं है"—इतना सुनकर सब खुशी-खुशी घर लौटे।
लेकिन दवाइयों के लगातार सेवन के बावजूद स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं दिख रहा था। मौसाजी और पिताजी ने बनारस जाने की तैयारी की। वहाँ एक बड़े अस्पताल में MRI जाँच पूरी हुई। शाम को मिली रिपोर्ट ने सारे शंकाओं को समाप्त कर दिया—नसों में किसी प्रकार की समस्या नहीं थी। लेकिन सवाल अब भी वही था कि तकलीफ आखिर क्यों है?
अब तक आसपास के गाँव और रिश्तेदारों में यह खबर हल्के धुएँ की तरह फैल रही थी। उस धुएँ से कुछ आँखों में आँसू बह निकले। बहते अश्रुओं के साथ लोगों का घर आना शुरू हुआ। इसी दौरान मैं भी घर गया हुआ था। मिलने वाले सिर्फ प्रेम, चिंता, आदर या फल लेकर ही नहीं आ रहे थे, साथ में सलाह की एक पोटली भी खोल रहे थे। वह सलाह उचित थी या अनुचित, इससे सभी अनजान थे—बताने वाला भी और सुनने वाला भी, जो बस शांत था। हर सलाह में कोई तीसरा व्यक्ति शामिल होता था जिसे बताने वाला दूर या करीब से जानता था। वास्तव में, हमें जानने-बताने से ज्यादा 'समझने' की आवश्यकता होनी चाहिए।
उन्हीं सलाहकारों में से एक ने आत्मविश्वास से भरकर कहा, "अरे बाबू, यह तो पक्का गठिया है... पक्का! इसमें गांठ-गांठ दुखता है, और कुछ नहीं है। हम राजगढ़ में एक वैद्य को जानते हैं, वो इसका सटीक इलाज करता है। तुरंत सब हल्का हो जाएगा। आप कल तैयार रहिएगा।"
जब इंसान मानसिक कष्ट में होता है, तो बुद्धि धोखा देती है; लेकिन शारीरिक कष्ट बुद्धि और विवेक दोनों को हर लेता है। कष्ट से बाहर निकलने की उम्मीद में हर सलाह संजीवनी बूटी लगती है—अनपढ़ और ज्ञानी दोनों की बातें समान प्रतीत होने लगती हैं। मैं घर पर था और साथ में राजगढ़ भी जा रहा था। मैं उम्र में इतना छोटा था कि किसी सलाह को समझने की क्षमता मुझमें नहीं थी। मेरे पास पिताजी के लिए कोई सलाह नहीं थी, मैं बस सेवा के भाव से खुद को समर्पित कर रहा था। भैया उस वक्त ओबरा में बाहर थे, इसलिए वे न जा सके। पिताजी के साथ दादाजी भी गए थे, जिन्हें पुरानी गठिया की शिकायत थी, और सलाह देने वाले मामा श्री—जिन्हें पूरा गाँव 'जगत मामा' कहता था, पर वे पिताजी के सगे मामा थे।
वहाँ पहुँचते ही हमारी मुलाकात छोटे कद, लटकती तोंद, बड़े बाल और दाढ़ी वाले एक बाबा से हुई, जो शर्तिया इलाज की गारंटी लिए बैठा था। देखते ही उसने लालची मुस्कान के साथ सबका स्वागत किया और अपना औजार निकाला—एक टेढ़ी सुई, जिसे वह हर जोड़ पर चुभाने वाला था।
"का बाबू, एक दिन में कै बेरी साँस लेवअ?"—मुझसे उसने एक बेतुका सवाल किया और पान चबाते हुए काले-गंदे दाँतों को निकालकर खुद ही जवाब दिया। फिर उसने सुई जोड़ों पर चुभो दी। गाढ़ा खून बाहर निकलने लगा और वह जोर-जोर से पैरों को दबाने लगा, यह कहते हुए कि सारा गंदा रक्त बाहर निकल रहा है। "बतावा, कईसन लागत ह?"
पिताजी ने 'हाँ' में सिर हिलाया। उस वक्त उनका सिर हिलाना अच्छा था या बुरा, मैं नहीं समझ सका। उस ढोंगी ने हँसते हुए कहा, "कुल ठीक हो जाई।" और एक पुड़िया में पिसा हुआ चूर्ण पकड़ाकर 1000 रुपये की पर्ची काट दी।
भारी मात्रा में खून बहवाने के बाद, हाथ में एक पुड़िया लिए हम देर रात घर पहुँचे। माँ रसोई से, हाथों में आटा रँगे दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई। मैंने माँ को बचपन से ज्यादातर समय रसोईघर में ही देखा था। मैंने उन्हें कभी थककर आराम करते नहीं देखा, बस खटते देखा था। हमारे सोने के बाद सोतीं और उठने से पहले उठ जाती थीं। दरवाजे पर खड़ी माँ ने मुझे उम्मीद भरी नजरों से देखा, लेकिन मैं उनकी ओर विश्वास भरी नजरों से नहीं देख पाया। मैं सच में इस नाटकीय इलाज से संतुष्ट नहीं था।
पिताजी ने हल्का भोजन किया और थकान का हवाला देकर सोना उचित समझा। उनकी इस थकान को मैंने उनका अस्वस्थ महसूस करना समझा—जो कि सच था। उस ढोंगी के सामने हिलाया गया सिर आराम का नहीं, बल्कि अफसोस का प्रतीक था। पिताजी को वहाँ जाकर गलती करने का अहसास वहीं हो चुका था।
अगली सुबह का सूरज अपने साथ पीड़ाओं का संदेश लेकर आया। पिताजी उस पीड़ा को भोग रहे थे, माँ उस पीड़ा में जी रही थीं, और हम सब उसकी आँच झेल रहे थे।
दवा और ढोंगी—दोनों के बेअसर होने के बाद सबने दूसरी राह देखना शुरू किया। गाँव में आज भी विज्ञान हर उस जगह हार जाता है जहाँ कोई दवा बेअसर हो जाती है, और उस बेअसर दवा के आगे अंधविश्वास जीत जाता है। हनुमान चालीसा से भूत-पिशाच न मिटा पाने वाले लोग तंत्र-मंत्र से अभिमंत्रित करके कष्ट निवारण की बात करने लगते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। किसी ने सोने से पहले शिव जप की सलाह दी, किसी ने कमरे के कोने में अगरबत्ती जलाने को कहा, तो किसी ने सिरहाने लोहे की वस्तु रखने को।
इसी दौरान पिताजी फोन पर मौसाजी से बात कर रहे थे। मौसाजी दूसरे छोर से लखनऊ के बड़े अस्पताल में दिखाने की सलाह दे रहे थे। पास बैठी फुआ—जो पिताजी को देखने आई थीं—यह सब सुन रही थीं। मैं पास ही खड़ा अपने पैर के अंगूठे को जमीन पर रगड़ रहा था। अचानक मैंने देखा कि फुआ की साँसें तेज होने लगीं, उनकी आँखों में असाधारण-सा बड़ापन आ गया, शरीर में तेज अकड़न और भारी आवाज निकलने लगी। यह सब देखकर मैं डर गया। भीतर से माँ, आजी और बैठका से बाबा दौड़े आए। तब तक फुआ द्वारा पिताजी की कमर पर लात से दो-तीन प्रहार किए जा चुके थे—"कहीं चल जा, ठीक ना होबे... हमरे लग्गे आवे के पड़ी!"
मैं यह सब देखकर रो रहा था। मेरे सामने एक अजीब और भयानक घटना घट रही थी, जिससे मेरा सामना कभी नहीं हुआ था। मैं रोते हुए पिताजी के पास गया और डरकर उन्हें जोर से पकड़ लिया। वे मुझे सहलाते रहे। अचानक देखा कि माँ घुटने पर बैठकर फुआ से माफी माँग रही हैं—"क्षमा देवी... क्षमा, माफ कर दें।" कुछ ऐसा ही मैंने आजी को भी करते देखा। मैं स्तब्ध था, शायद मैं इसके लिए तैयार नहीं था... आज भी नहीं हूँ। माँ ने बाद में बताया कि मुठेर की देवी माँ आई थीं। सबने मिलकर राय बनाई कि देवी माँ ने बुलाया है, वहाँ जाना चाहिए।
पिताजी चुप थे। अब वे वही कर रहे थे जो सामने वाले तय करते। वे इस अप्रत्याशित तकलीफ से थक चुके थे। माँ, पिताजी, भैया और मैं साथ घर से निकले। मैं वापस शक्तिनगर चला गया और पिताजी मुठेर के लिए निकले। विदाई के वक्त पिताजी की नजरों में मैंने अपने लिए अथाह प्रेम देखा—इतना कि मैं उसमें जीवन भर तैर सकता हूँ, हर डुबकी में उनसे मुलाकात कर सकता हूँ। वह मेरी पिताजी से अंतिम मुलाकात थी, उसके बाद मुझे यह सौभाग्य कभी नहीं मिला।
मंदिर पहुँचते ही जानकारी मिली कि मंदिर की प्रतिनिधि वहाँ नहीं है—जो खुद को भगवान (देवी का रूप) बताती थी। मूर्तिवत देवी अब भी वहाँ विराजमान थीं, लेकिन वे यह दावा नहीं कर रही थीं कि "तुझे मैंने बुलाया है।" वे सभी भक्तों की तरह पिताजी को भी अपना आशीर्वाद दे रही थीं। आधुनिक युग की उस 'देवी' से जब फोन पर संपर्क किया गया, तो उसने बाहर होने की बात कही, पर पिताजी को शहर से बाहर न जाने की सलाह दी। "सिवान से बाहर जाना उचित नहीं"—इस दलील ने पिताजी को इस उम्मीद में बाँधे रखा कि देवी ने बुलाया है, देवी ने बोला है। उम्मीद को दीमक लगता गया, दिन बीतते गए। आधुनिक देवी ठंड की धुंध में धुँधलाती गई और उधर पिताजी की तबीयत बिगड़ती चली गई।
थक-हारकर उन्हें पास के ही अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बार इलाज में पीलिया के संकेत थे। दवा चल रही थी—अब सिर्फ दवा का सहारा था, देवी का नहीं। डॉक्टर का कहना था कि देवी द्वारा की गई देरी से बहुत देर हो चुकी थी, पीलिया आंतों तक पहुँच गया था। इलाज के दौरान एक दिन डॉक्टर की बड़ी लापरवाही ने बँधती उम्मीदों पर खंजर चला दिया—पिताजी को एक्सपायरी (पुरानी डेट का) इंजेक्शन दे दिया गया। हम वापस वहाँ से भागे। बनारस के डॉक्टरों से होते हुए भैया उन्हें लेकर लखनऊ भागे। छोटे बाबा, जो हमेशा सहारा थे, उनकी मदद से अस्पतालों की भीड़भाड़ से इतर हमें जल्दी प्रवेश मिल गया। इलाज जारी था।
कुछ दिनों के आंशिक सुधार के बाद वापस दुनिया बदलने लगी। पिताजी का रंग-रूप बदलने लगा, शरीर से पपड़ियाँ छूटने लगीं। कुछ ही दिनों में देह से सारे कपड़े उतार फेंके गए। मेरे पिताजी हमेशा कपड़ों के शौकीन रहे थे—तरह-तरह के कुर्ते और सदरी (जो ज्यादातर छोटे बाबा की पसंद की होती थीं), लेकिन अंत समय में वह सब छिनता गया। पास होते हुए भी छिनता गया... जिंदा रहते छिनता गया।
लेकिन किसी ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। छोटे बाबा इस स्थिति को देखकर भी सजल आँखों से उन्हें दिल्ली के अस्पताल ले जाने की बात कर रहे थे। किसी ने मुझसे पिताजी की कुंडली पंडित जी को दिखाने को कहा। मैं भागा-भागा घर गया, वहाँ से कुंडली लेकर शक्तिनगर में घर के सामने वाले पंडित जी के पास आया। उन्होंने कहा, "ग्रह है, टल गया तो लंबी आयु होगी... अभिषेक करना होगा।" मैं वह सब करने को तैयार था जो पिताजी के लिए आवश्यक था। वास्तव में हम स्वार्थी होते हैं, हम अपने फायदे के लिए सब कुछ ढूँढते हैं। मैं भी अपने पिताजी की बिखरती, गुम होती साँसें ढूँढ रहा था—जो न तो मुक्त हवा में थीं और न उस अस्पताल में, जहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। मैं उन्हें मंदिर में, इस अभिषेक में, भक्ति में ढूँढ रहा था।
मैंने अभिषेक प्रारंभ किया, लेकिन मेरे डर ने मुझे कभी भक्तिमय नहीं होने दिया। मेरा डर जीतता गया और पिताजी की अस्वस्थता बढ़ती गई। (कुछ दिन पहले भी एक पंडित ने ग्रह का प्रभाव बताया था, जिसके बाद से माँ हर बृहस्पतिवार को व्रत रखती थी। वास्तव में यह सब सच से भागने का एक मनगढ़ंत रास्ता था, जिस पर लंबा भटकाव था, स्थिरता नहीं थी, जीवन नहीं था।)
मैंने पिताजी से फोन पर बात की—नहीं, मैं फोन पर रोया। वहाँ आने की ज़िद की। वे नहीं माने। वे ज्यादा नहीं बोले, बस इतना कहा, "हम ठीक हैं बेटा, चिंता मत कर।" मैं रोता रहा। अंत में पिताजी ने कहा, "बेटा हमारा आज्ञाकारी है, पिता-भक्त है।" मैं फोन रखकर रोता रहा। उनकी आवाज थक चुकी थी, वे खुद थक चुके थे। वे सच को अपनाने के लिए अब भी तैयार नहीं थे।
यहाँ मेरा दम घुट रहा था। भैया और रोशन भैया दिन-रात निष्ठा और लगन से उनकी सेवा में तत्पर थे। रिश्तेदारों का आना-जाना प्रारंभ था। उसी शाम मैंने रोशन भैया को फोन किया। उन्होंने खुद को संभालते हुए 'सब ठीक है' कहकर मुझे बहलाने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वे फूट पड़े—"अब बस अंतिम समय है, तुम यहाँ मत आओ।"
बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक हमारे घर जाने की तैयारी करा दी गई। मैं और मीनू (मेरी फुआ की लड़की) दादाजी के कमरे पर ठहरे, जहाँ से हमें घर जाना था। सुबह गाड़ी लेकर एक सज्जन आए, जो रिश्ते में चाचा लगते थे। उन्होंने दया की दृष्टि से मुझे देखा, मेरी आँखों में आँसू थे। वे बोले, "चिंता मत कर, वो लोग दिल्ली जा रहे हैं।" लेकिन वे मुझसे नजरें नहीं मिला पा रहे थे। मैं रास्ते भर हर उस व्यक्ति को फोन करता रहा जो पिताजी के पास था, लेकिन किसी का फोन नहीं लग रहा था।
घर पहुँचा तो दरवाजे पर भारी भीड़ थी। इतना देखते ही मैंने अनहोनी का अंदाजा लगा लिया। एक पिता (बाबा) चबूतरे पर बैठकर बिलख-बिलखकर रो रहे थे। उनके सामने की जमीन को गोबर से लीपा जा रहा था। कुछ लोग बाँस काट रहे थे, जिसकी आवाज साफ आ रही थी। लोग उन्हें संभाल रहे थे। वे अपने आप को दुनिया का सबसे अभागा व्यक्ति मानकर भगवान को कोस रहे थे, अपने पापों की सजा में खुद के लिए तत्काल मौत माँग रहे थे।
अंदर आँगन में माँ बेहोश पड़ी थीं। उन्हें जबरन होश में लाया जा रहा था। होश में आते ही "कहाँ गइल हो हमार लाल!" कहकर वे वापस मूर्छित हो जाती थीं। वहाँ वे तमाम लोग थे जो पिताजी से जुड़े थे, सबकी आँखें नम थीं। एक मैं था, जो इन सब के बीच माँ को ढूँढ रहा था। घर का पूरा चक्कर लगाकर भी मैं माँ को नहीं देख पा रहा था। अचानक मुझे पिताजी के साफ-सुथरे कपड़े नजर आए। मैं उनसे लिपटकर रोने लगा। उनमें पिताजी की वही पुरानी खुशबू आ रही थी, जो कुछ समय तक उनके देह से चिपकी रहती थी। मैं फूट-फूटकर रो रहा था, उन यादों में तैर रहा था जिन्हें मैंने अब तक सहेजा था। भले ही उनके साथ कम समय मिला, लेकिन यादों का घोंसला बहुत मजबूत बन चुका था—जिसमें मैं आज भी उनकी खुशबू महसूस करता हूँ और चैन से सोता हूँ।
अचानक कोई भीतर से आया और मुझे चुप कराता हुआ माँ के पास ले गया। माँ अंदर अँधेरे कोने में लेटी हुई थीं—बिल्कुल कमजोर। पिताजी की सेवा में उन्होंने अपना सब कुछ त्याग दिया था, बस चंद साँसें और कृषकाय देह थी जो उन्होंने हमारे लिए बचा रखी थीं। माँ बिल्कुल शांत थीं, उनकी आँखों में आँसू नहीं, एक गहरा शून्य था—जो यह दर्शा रहा था कि अब उनके पास शून्य के सिवा कुछ नहीं बचा। उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था। माँ मुझे चुप कराती रहीं। मैं माँ को न रोने की कसम देता रहा। माँ मेरे सामने बिल्कुल नहीं रोईं।
मैं बाहर बाबा के पास आ गया। मैं नहीं रोया... फिर मैं कभी नहीं रोया। बाबा मुझे उम्मीद भरी नजरों से देखते रहे। उनकी आँखों में बड़े-बड़े आँसूंओं के बीच पिताजी का चित्र तैर रहा था, जो हर बूंद के साथ धरती में मिल रहा था। सभी पिताजी के पार्थिव शरीर के आने का इंतजार कर रहे थे। गाँव के हर वर्ग, हर जाति और हर समुदाय के लोग घर पहुँच रहे थे। पूरी छत भीड़ से भर चुकी थी। हर ओर से क्रंदन की आवाज आ रही थी जो मन को विचलित कर रही थी।
मैं बैठका के एक कोने में जाकर बैठ गया। पिताजी का देह आया। अचानक रोने की आवाज और तेज हो गई। भीतर से माँ गिरते-पड़ते बिलखती हुई बाहर आईं—तमाम शिकायतों की पोटली लिए। वह पिताजी से अपने कष्टों की शिकायत कर रही थीं। हर चीख से मानो धरती का कलेजा फट रहा हो। माँ को इस हालत में देखकर मुझे लगा कि या तो भगवान नहीं है, और यदि है तो अपने कृत्य पर शर्मिंदा है। माँ ने झूठ बोला था—वह खूब रोईं। उनके आँसू सूखे नहीं थे, पुत्र का बाँध उन्हें रोके हुए था जो पति को देखते ही टूट गया। वहाँ मौजूद सभी लोग रोए। सबकी आँखों में बेहिसाब आँसू थे—इतने कि अगर एकत्र किए जाते तो भावनाओं की बाढ़ आ जाती। रोने की तेज आवाजें पहाड़ों से टकराकर और तकलीफ दे रही थीं।
मैंने पिताजी के चरणों को स्पर्श किया, जिन्हें एक बैग में बंद करके लाया गया था। मैं पिताजी का चेहरा नहीं देख सका। लोग कहते हैं कि वह बिल्कुल बदल गया था, किसी अनजान चेहरे जैसा हो गया था। मुझे तो पिताजी का वही पुराना चेहरा याद है।
मुझे तुरंत वहाँ से हटाया गया। फूफाजी मेरे पास आए और बिलखते हुए बोले, "माफ कर दो बाबू, हम तुमसे झूठ बोले।" मेरे सामने भैया निढाल होकर रो रहे थे। एक पुत्र, जिसने पिताजी के अंतिम समय को जिया था, वह उनके जाने पर अकेला महसूस कर रहा था। एक ऐसा पुत्र, जिसके कंधों पर सारी जिम्मेदारी थोप दी गई थी—मात्र इसलिए क्योंकि वह बड़ा था।
भैया को अंत्येष्टि के लिए तैयार किया गया। पिताजी ने नए जीवन में प्रवेश किया।

लोग कहते हैं कि उस दिन मेरे पिताजी की बीमारी से मृत्यु हुई थी। लेकिन मेरा मन और मेरी आत्मा आज भी चीख-चीखकर कहती है कि वह मृत्यु नहीं थी—वह एक सुनियोजित हत्या थी।

एक ऐसी हत्या, जिसकी कहानी धर्म के आवरण में लिखे गए ढोंग ने रची थी। जहाँ देवी का छलावा बनकर बैठी एक पाखंडी औरत ने समय को दीमक की तरह चाटा, जहाँ राजगढ़ के उस ढोंगी बाबा की सूई से बहते खून ने शरीर की बची-खुची ताकत निचोड़ ली, और जहाँ चिकित्सा की लापरवाही रूपी खंजर ने उम्मीदों का गला घोंट दिया। 

धर्म और आस्था के नाम पर फैले इस आडंबर ने भगवान को तो कहीं नहीं दिखाया, पर मेरी आँखों के सामने मेरे पिता को धीरे-धीरे घोंट-घोंटकर मार डाला। उस दिन सिर्फ मेरे पिता की साँसें बंद नहीं हुई थीं... उस दिन धर्म के ढोंग, देवी के पाखंड और समाज के अंधे विश्वास ने मिलकर मेरे पिता की हत्या की थी।
कुछ वर्षों के पश्चात अखबार में खबर छपी की स्वघोषित देवी मां को  हत्या के आरोप में जेल हुई है। 

Tuesday, August 25, 2026

परिधी के इस पार - पीयूष चतुर्वेदी

जब बाबा हमें छोड़कर चले गए—हमसे दूर, जहाँ हम नहीं जा सकते। जहाँ हमारा जाना संभव भी नहीं था और जहाँ से कोई वापसी नहीं। बाबा कितने भी प्रिय और आत्मीय थे, पर वे उस परिधि को नहीं लाँघ सकते थे। वहाँ की वास्तविकता को हम कभी नहीं छू सकते, और इस ओर फैले अंधकार में एक भारी सन्नाटा सदैव जीवित रहेगा। सदैव वर्तमान जिसे हम सिर्फ छुपा सकते हैं भूला नहीं सकते। 

ये जो दुख के क्षण हैं, वह ठीक-ठीक जीवन को दोबारा बाबा की उस देह की अनुपस्थिति में जीना है। जिसमें इत्र की सुंगध थी। कपड़ों का सूघरपन और चेहरे पर अनुपम मुस्कान,आंखों में चंचलता। मस्तिष्क में अलौकिक आभा।
वर्तमान में फैला यह काला अंधेरा हमारे आँसुओं द्वारा धुलता जाएगा। मैं जानता हूं आँखों का धुंधलापन और यह झिल्लीनुमा दृष्टि लंबा समय लेगी इस अंधेरे को काटने के लिए। या शायद यह सदैव नुकिली बनी रहे। पिताजी की मृत्यु की तरह चुभती रहे। 

लेकिन शांतिपूर्ण भविष्य की कल्पना में सिर्फ स्मृतियों का प्रकाश ही है जो हमें और रुलाएगा, और आँखों की झिल्ली साफ होती जाएगी। फिर हमें आभास होगा कि बाबा अपने पीछे कितना सुंदर संसार छोड़ गए है।
बाबा से जुड़ी सारी भौतिकता हमारे सामने उपस्थित है, और उनकी सारी सूक्ष्मता हमारे भीतर।
उनके कपड़े, उनकी घड़ियाँ, उनकी लेखनी से भरी डायरियाँ... वे तमाम कतरनें जो कभी कहीं अधूरेपन का वर्तमान लिए आज भी जिंदा हैं।
कितना कुछ रह गया है हमारे बीच, और उससे भी ज्यादा हमारे भीतर।

अमरता को जीवंत करता दूसरी दुनिया में पहुँचा व्यक्ति, हमारे साथ उसी समय हमारी दुनिया में भी जीवित रहता है। हर व्यक्ति दुनिया में बसी तमाम दुनियाओं में एक साथ जिंदा रह सकता है। व्यक्ति सदैव जीवित रहता है जब तक कोई उसे पूरी तरह भूल न जाए।

और मेरे लिए बाबा की ऐसी अनुपस्थिति या उन्हें भूल जाने की कल्पना करना भी एक त्रासदी जैसा है।

Saturday, August 22, 2026

स्मृतियों का जूठन

पिताजी से मिलने की भूख हमेशा अधूरी ही रही।
जून की उस उबलती धूप में भी मैं न जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहता था। और दिसंबर की उस छितराई, कमज़ोर धूप में थकान का बोझ लिए शाम ढलते ही सो जाया करता। पर सर्द रातों के बाद जब भोर जवान होती, मैं अचानक पास पिताजी को पाता।
उनकी देह से एक मीठी गंध बहती थी—ऐसी गंध जिसे चखा नहीं जा सकता, पर जो किसी बहुत परिश्रम और सब्र से पकाए गए भोजन की तरह मन को तृप्त कर दे। उसकी महक से एक लालची संतोष पेट को आधा भर देता... पर मेरी भूख का बाकी आधा हिस्सा हमेशा ख़ाली ही रहा।
मेरे बचपन के दिनों में पिताजी इतने जवान और विशाल थे कि मैं उनके साये में कभी ठीक से बड़ा हो ही नहीं पाया। मैं हमेशा 'छोटू' ही रहा—अंत तक। उनके सुख में, नहीं- नहीं... उनके संघर्ष में, उनके दुख में। उनकी देह से फूटती हर उस पीड़ा में, जो करवट बदलते ही शरीर के किसी दूसरे कोने से फिर उभर आती थी।
और उस असह्य पीड़ा को सहते हुए भी, उन्होंने मेरा नाम पुकारा था।
अगर गर्मी की छुट्टियों और जाड़े की ठिठुरन को आपस में जोड़ूँ, तो स्मृतियों के केवल तीन साल ही चुरा पाता हूँ। समय की सबसे छोटी इकाई में नापूँ, तो ये बरस शायद चंद महीनों में सिमट जाएँ। शायद यही वजह है कि अब मैं जीवन में हर छोटी से छोटी चीज़ को सहेजने लगा हूँ।
क्या कुछ और भी गिनना बाकी रह गया है?
या इन बीते बरसों के खोल में ही सब कुछ उलझकर रह गया है? किसी कमज़ोर जाले जैसा, जिसे कोई छिपकली किसी रोज़ अपने साथ बुहार ले जाएगी...
और जब मैं स्मृतियों का यह जूठन लेकर ईश्वर की ओर देखता हूँ, जो मंदिर में शांत और निरीह आँखों से मुझे ताकता रहता है ,तब भीतर एक थका हुआ वैराग्य जन्म लेता है। उस पत्थर के भगवान के आगे मेरे पिताजी कहीं अधिक जीवंत और विशाल नज़र आते हैं, और ईश्वर का वह मौन... यथार्थ की इस दुधिया मुस्कान के सामने बेहद बौना और कमज़ोर लगने लगता है।

Sunday, August 2, 2026

कनहर की कलकल- पीयूष चतुर्वेदी

कनहर की कलकल बहती धारा आज भी जब कानों में पड़ती है, तो लगता है जैसे समय की चादर पर ठहरे हुए संघर्ष की कोई पुरानी कहानी आज भी बह रही है।
बचपन के दिन याद आते हैं। नदी में उफान आते ही जीवन जैसे अचानक अव्यस्थित जाता था। मेरा जन्म तो गांव की आरंभिक विकास के बाद हुआ। जब सड़कों पर साइकिल से चलना संभव था। पैदल थोड़ा और सहज। लेकिन बड़े इस समस्या का वर्णन अक्सर अपने स्मृतियों में करते हैं। जब बैलगाड़ी और घोड़ा सबसे सुलभ और सुरक्षित साधन हुआ करते थे। नाव ही उस पार जाने का इकलौता जरिया हुआ करती थी और फिर नदी के दूसरे छोर पर पहुँचकर तेलगुड़वा के लिए कमांडर का सहारा लेना होता था। जो भीड़ से ठसाठस भरी हुई हुआ करती थी। संकट भरा रास्ता सिर्फ नदी पार करने पर खत्म नहीं होता था।
जब जलस्तर सीमा लांघ जाता, तो रास्ता बदल जाता था दुद्धी और हाथिनाला के टेढ़े-मेढ़े, लंबे मार्गों से होकर मुख्य मार्ग तक पहुँचना पड़ता था। यह जद्दोजहद केवल गाँव तक सीमित नहीं थी, कई बार बाढ़ का पानी सीधे घर के आँगनों तक दस्तक दे देता था। अपने हीं गांव में लोगों ने पलायन को बार-बार जीया। बाढ़ का उफनता पानी हर वर्ष घरों में पहुंचता…..फिर एक समय की उब के बाद सभी घर मकान में तब्दील हुए। सभी ने ऊंचाई पर पुनः मकान निर्माण कराया जो अब स्थाई घर का स्वरूप ले रहा है। 
वे ऊँच-खाल भरे रास्ते कभी इतने सहज नहीं थे कि हर उम्र या हर स्थिति का इंसान उन पर आसानी से कदम बढ़ा सके। अभावों और कठिन भौगोलिक रास्तों के उस दौर में, बाबा ने सबसे पहले सड़कों की महत्ता को समझा। एक पुल की सोच ने उसी संघर्ष के बीच जन्म लिया था। दूर-दूर तक फैले उस अंचल में जब पीने योग्य पानी के सीमित जल स्रोत थे, तब उन्होंने बुनियादी ज़रूरतों को प्राथमिकता दी और लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
विकास और लोक-कल्याण का यह बीज रायबरेली में सरकारी विभाग में कार्यरत बाबा स्वर्गीय गिरीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने बोया था, लेकिन उस विचार रूपी पौधे की निस्वार्थ सेवा और सींचने का काम पूज्य स्वर्गीय जय प्रकाश चतुर्वेदी जी ने अपने अनवरत तप से किया।
आज जब उस पुल को देखते हैं, तो स्पष्ट महसूस होता है कि कनहर पर बना यह पुल केवल कंक्रीट और सीमेंट का ढांचा मात्र नहीं है। यह लोक-कल्याण के लिए एक कर्मयोगी के जीवन भर के तप का प्रतिफल है। स्वर्गीय चतुर्वेदी जी के भागीरथी प्रयासों और तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय (स्व.) कल्याण सिंह जी की संवेदनशीलता से निर्मित यह पुल इस पूरे अंचल की जीवंत धड़कन है।
इस पुल का नामकरण 'श्री जय प्रकाश चतुर्वेदी स्मृति सेतु' किया जाना केवल एक नाम बदलना नहीं होगा, बल्कि इस माटी के प्रति उनके निस्वार्थ समर्पण, दूरदर्शी सोच और संघर्ष को हमारी ओर से एक सच्ची और विनम्र श्रद्धांजलि होगी।
क्षेत्र के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों, माननीय भूपेश चौबे जी एवं राज्यमंत्री माननीय संजीव गौड़ जी से इस अंचल की जनभावनाओं का यही नम्र आग्रह है कि वे निष्काम कर्मयोगी स्वर्गीय चतुर्वेदी जी के इस ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देते हुए इस पुण्य कार्य को मूर्त रूप प्रदान करें। ताकि कनहर की लहरों के साथ-साथ यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनकर जीवित रहे। 

Wednesday, July 29, 2026

ठहरा हुआ समय और धूप-छाँव सी स्मृतियाँ: एक निष्काम कर्मयोगी का जीवन-वृत्त


जीवन चित्रण 

ठहरा हुआ समय और धूप-छाँव सी स्मृतियाँ: एक निष्काम कर्मयोगी का जीवन-वृत्त

​हम जब भी पीछे मुड़कर देखते हैं, तो इतिहास हमें केवल तारीखों और बड़े-बड़े मंचों से दी गई गर्जनाओं में याद नहीं आता। वह याद आता है कुछ बेहद शांत चेहरों की आभा में, कुछ ठहरी हुई आत्मीय मुस्कुराहटों में, और एक ऐसे त्याग में जिसने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा।

बाबा—यानी जय प्रकाश चतुर्वेदी जी।

​जब वे अस्पताल के उस बेजान और उजले कमरे में उपचाराधीन थे—जहाँ दीवारों पर जीवन की जीवंतता के बजाय केवल टूटती साँसों का सूनापन था और मशीनों की एक अनवरत, एकरस ध्वनि गूँज रही थी—तब सोनभद्र की पहाड़ियों से लेकर लखनऊ के पुराने, धूल भरे रास्तों तक फैले उनके 79 वर्षों के जीवन की स्मृतियाँ एक-एक करके आँखों के सामने से गुज़रने लगती थीं। ऐसा लगता था मानो समय की किसी पुरानी किताब के पन्ने हवा से स्वयं पलट रहे हों। वहाँ आप केवल बैठकर देख नहीं सकते थे; स्मृतियों के उस प्रवाह में आपको निरंतर साथ चलना होता था।

अयोध्या की गलियाँ और वो सत्तर का दशक

​उनके पूज्य पिता रामआधार चतुर्वेदी जी के संस्कारों की वह कैसी निर्मल छाँव रही होगी, जिसने अपने बेटे को एक ऐसे मार्ग पर जाने दिया जहाँ केवल अनिश्चितता और कठिन साधना थी। 1962 की चीनी आक्रमण की धुंध के बीच संघ की शाखा से शुरू हुआ यह सफर 'प्रचारक' की कठिन, नीरव पगडंडियों पर आगे बढ़ता गया। फैज़ाबाद और अयोध्या की तंग गलियाँ, जहाँ सुबह की धूप भी विलंब से पहुँचती थी, वहाँ बाबा ने संघ के प्रचारक के रूप में अपनी युवावस्था का सबसे स्वर्णिम हिस्सा खामोशी से समर्पित कर दिया। गृहस्थ जीवन, प्रेम और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पीछे छोड़कर वे राष्ट्र-सेवा के मार्ग पर अग्रसर हो गए।

​वे केवल संगठन का विस्तार नहीं कर रहे थे; वे 'विद्या भारती' के माध्यम से उन बच्चों की आँखों में भविष्य के स्वप्न बो रहे थे। निर्धनता, निरक्षरता और अभावों से जूझती जनता के लिए उन्होंने सुलभ शिक्षा और पुस्तकों की व्यवस्था की।

राजनीतिक कोलाहल में शांत 'सारथी': लखनऊ का दौर

​समय का पहिया आगे बढ़ा और आया वर्ष 1992। देश एक नए दौर से गुज़र रहा था। बाबा को भारतीय जनता पार्टी के संगठन का दायित्व सौंपकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों में भेजा गया। काशी और गोरखपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में—जहाँ राजनीति का तापमान हमेशा ऊँचा रहता था, गोरखपुर में बाहुबल की चुनौतियाँ थीं तो काशी में प्रशासनिक व सांगठनिक संघर्ष—ऐसी तपिश के बीच भी बाबा एक ठंडी और शीतल छाँव की तरह कार्य करते रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ उनके संबंधों को केवल 'राजनीतिक' कहना उस प्रगाढ़ आत्मीयता का संकोच होगा। जब लखनऊ की गलियों में चुनावी कोलाहल अपने चरम पर होता, तब उस कोलाहल के पीछे बंद कमरे में अटल जी के साथ बैठकर सबसे जटिल सांगठनिक चक्रव्यूह को सादगी से सुलझाने वाले 'सारथी' बाबा ही थे। दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद था, जो बिना बोले सब कुछ कह जाता था।

​इसी प्रकार कल्याण सिंह जी का वह प्रसंग स्मरणीय है। सोनभद्र की पथरीली माटी पर जब एक पारिवारिक मांगलिक अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री आए, तो बाबा ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने केवल अपनी माटी के लोगों की पीड़ा और आवश्यकताएँ कल्याण सिंह जी के समक्ष रख दीं। विदाई के समय कल्याण सिंह जी ने मुस्कुराते हुए स्नेहस्वरूप क्षेत्र को एक 'पुल' की सौगात दे दी। यह राजनीति नहीं, बल्कि एक निष्काम साधक के प्रति सत्ता का वह आदर था जो आज के युग में विरले ही देखने को मिलता है। कलराज मिश्र जी भी उनकी सांगठनिक सौम्यता और विलक्षण सूझबूझ के सदैव प्रशंसक रहे।

गुप्ता धाम की सीढ़ियाँ: जन-सेवा ही प्रभु-सेवा

2004 से 2010 के मध्य जब वे विधान परिषद (MLC) के सदस्य रहे, तब भी वे लखनऊ के सचिवालयों की चमक-धमक से दूर सोनभद्र के चांची कला की माटी के बीच अधिक दिखाई दिए। गाँव में वर्ष 2003 में भव्य माँ दुर्गा एवं बजरंगबली मंदिर का निर्माण कराया तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रंगमंच के माध्यम से ग्रामीणों को जोड़कर उनके मनोरंजन को एक दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान की।

चांची कला की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित 'गुप्ता धाम' (गुप्तेश्वर महादेव) का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए एक अत्यंत कठिन परीक्षा जैसा था। बाबा ने वहाँ पक्की सीढ़ियों का निर्माण करवाया और पेयजल की समुचित व्यवस्था कराई। आज जब भी कोई वयोवृद्ध या बालक उन सीढ़ियों का सहारा लेकर बाबा गुप्तेश्वर के दरबार में पहुँचता है, तो वह अनजाने में ही बाबा के उस मौन संकल्प और तपस्या को नमन कर रहा होता है। 
गांव के नजदीकी कस्बे कोन में वर्ष 2007 में अपनी माता जी, स्वर्गीया राजवंशी देवी जी के स्मृति में उन्होंने विद्यालय का निर्माण कराया। जिसका उद्देश्य अच्छी शिक्षा तथा विशेष रूप से बालिकाओं के लिए शिक्षा को सुलभ बनाना था। पहाड़ी रास्तों के अहंकार को चिरते हुए उन्होंने यातायात की संभावनाओं को पुख्ता किया। वरिष्ठ भाजपा नेता माननीय कलराज मिश्र जी के सहायता और सानिध्य में सड़कों का निर्माण कराया। लालटेन की गुप्त पीली रोशनी में थकती आंखों को बिजली की सुगम व्यवस्था करा नई और धुली हुई रोशनी प्रदान की। 

​वे केवल उत्तर प्रदेश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहे। जब भी संगठन को आवश्यकता पड़ी, वे अपना झोला उठाकर झारखंड और मध्य प्रदेश की अनजानी पगडंडियों पर निकल पड़े। उनके लिए न कोई सीमा थी, न कोई पराया।

महाप्रयाण और अंतिम श्रद्धांजलि

​समय का चक्र अंततः उस मोड़ पर आ पहुँचा जहाँ भौतिक उपस्थिति स्मृतियों में बदलने लगती है। 25 जुलाई को रात्रि 10:55 बजे बाबा ने अपनी अंतिम साँस ली और जीवन की इस लंबी यात्रा को विश्राम देकर अनत के मार्ग पर प्रस्थान कर गए।

​उनके देवलोकगमन के समाचार के साथ ही संपूर्ण संगठन और राजनीतिक परिवेश में शोक की लहर दौड़ गई। 26 जुलाई की प्रातः उत्तर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में उनके अंतिम दर्शन का आयोजन किया गया, जहाँ पार्टी कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ राजनेताओं, समाजसेवियों और उनके स्नेही जन-समुदाय ने नम आँखों से अपने इस जनप्रिय, निष्काम कर्मयोगी को श्रद्धासुमन अर्पित किए। विभिन्न समाचार पत्रों और राजनैतिक मंचों पर उनके विचार, सरलता और दशकों की राष्ट्र-सेवा को आदरपूर्वक याद किया गया।

तत्पश्चात, उनके गृह जनपद सोनभद्र के उनके प्रिय ग्राम चांची कलां में पूर्ण राष्ट्रीय सम्मान (राजकीय सम्मान) के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। जिस मिट्टी को उन्होंने जीवन भर सींचा, जिस माटी के लोगों के कल्याण के लिए वे सदैव समर्पित रहे, अंततः वे उसी चांची कलां की माटी में विलीन हो गए।


संक्षिप्त जीवन परिचय 


नाम- जय प्रकाश चतुर्वेदी

पुत्र- स्व. राम आधार चतुर्वेदी

जन्म तिथि-14 अक्टूबर 1946

मृत्यु तिथि - 25 जुलाई 2026 रात्रि 10:55:11 

आयु- 79 वर्ष

शिक्षा- एम. ए. (प्रो) अर्थशास्त्र

संघ शिक्षा- वर्ष 1962 से स्वयं सेवक- तृतिय वर्ष प्रशिक्षित।

प्रचारक- 1972 से नगर,जिला,विभाग प्रचारक साथ हीं विद्या भारती पूर्वी क्षेत्र प्रमुख।


भारतीय जनता पार्टी में योजन-

. वर्ष 1992 से उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रों के संगठन मंत्री।

. 2003 में प्रचारक जिवन से निवृत्त,भाजपा संगठन मंत्री पद से भी।

. काशी, गोरखपुर क्षेत्र प्रभारी।

. प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, राष्ट्रीय परिषद सदस्य।

. वर्ष 2004-2010 उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य।

. पार्टी के निर्देशों पर उत्तर प्रदेश के सभी चुनाव में सक्रिय भूमिका।

. झारखंड, मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की योजना से पूर्व समय देकर कार्य किया।



माननीय वरिष्ठ राजनेताओं द्वारा अर्पित श्रद्धांजलि।



Tuesday, July 28, 2026

बरगद की छांव और गिलहरी के आंसू- (ईश्वर होने के कुछ क्षण)

मैं केन्द्र को छूकर परिधी से बाहर भाग जाता हूं 

             ( उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माननीय राम                                 नाईक जी के साथ वर्ष- 2016)



वो सफेद हाफ टी-शर्ट में हास्पिटल के बेड पर पीठ के बल लेटे हुए थे। आंखों का चश्मा थकान के कारण थोड़ा निचे सरक आया था। गालों पर सफेद दाढ़ी उनकी अलसाई हुई झुर्रियों से बाहर झांक रहीं थीं। जो मेरे स्मृतियों में कहीं अंकित नहीं था। मैंने बाबा को सदैव सुसज्जित और सुदर्शन अवस्था में पाया है। बाबा की देंह बहुत तेजी से बड़ी हो रही है। रेखाएं कहीं नहीं जाना चाहतीं, वो ठीक-ठीक वहीं छुपती जा रहीं हैं जहां वो उम्र के सराय पर विश्राम के लिए ठहरी थीं। झुर्रियां कभी उगती हैं कभी छुप जाती हैं। 

                       (बाबा के साथ वर्ष- 2022)

मैं उनके पास पहुंचा और चेहरे के पास थोड़ा झुककर कहा.. बाबा आज आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं। 
कल से आप बहुत बेहतर हैं। और सोडियम भी अच्छी जगह पहुंच रहा है। (बाबा को आई.सी.यू. में सोडियम की कमी के कारण भर्ती किया गया है।)


थोड़ा मुस्कुराते हुए, (जो उनके स्वस्थ चेहरे पर हमेशा विद्यमान रहती है) उन्होंने कहा, तोहरो चेहरा आज ठीक लगत बा। कल लग रहा था कि जैसे थकान बहुत ज्यादा हो गई है तुम्हें। 

मैं अभी विश्राम करके आ रहा हूं। अच्छी नींद ली है मैंने। 
बाबा ने थोड़ा और मजबूत मुस्कान अपने चेहरे पर लाने का प्रयास किया और मैं उनके बाल सहलाने लगा। (वर्तमान में वो हर छोटे परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।) 
उन्होंने मुझे अपनी गोल बड़ी और सजल नेत्रों से देखते हुए पूछा, कंघी कहां बा हमार? उनकी आंखों में मैं तैर रहा था। मैं उस पवित्रता में तैरता हुआ उनसे झूठ नहीं बोलना चाहता था। थोड़ा अलग हटकर , ठीक उस दूरी से जहां से वो मेरी धीमी आवाज को सुन सकें, मैंने कहा बाबा आपके बाल ऐसे हीं सजे हुए लगते हैं। अभी ये व्यवस्थित हैं। 
यह झूठ था। बाबा के बाल के संबंध में नहीं। कंघी के संबंध में। 
जबसे उन्होंने अपने स्वास्थ्य में हल्का सुधार पाया है वो अपने नैसर्गिकता के बहुत समीप पहुंचना चाहते हैं। 
उम्र और अस्वस्थता के जालों को तोड़ते हुए वो उस जीवन को छूना चाहते हैं जो वह जीते आए थे। लेकिन हर छोटी इच्छा को उनका क्षीण होता स्वास्थ्य निगल लेता। जाले तक पहुंचते हाथों को कभी तेज खांसी, कफ का कोई मलवा या सांसों से उनकी लड़ाई पीछे खींच लेती। इन सभी को हरा वो वहां पहुंच भी जाते तो दस्त उन्हें बहुत पिछे ढकेल देता। भोजन की मात्रा बहुत कम हो गई है। पीड़ा उनके होंठों पर नृत्य कर रही है। कंपकंपाती हथेलियां अपने सारे दैनिक कार्य स्वयं से करने का साहस बटोर रही हैं।
फिर भी उनकी सहनशीलता और धैर्य के समक्ष ये सब बौने नजर आ रहे थे। लेकिन हम उनके द्वारा निर्देशित चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में रखते। और उनकी इच्छाओं को आई.सी.यू और हास्पिटल के पैमाने पर परखते हुए प्रेषित करते। 
कभी-कभी इसका झुंझलाहट उनके चेहरे पर साफ नजर आता। उनके व्यवहार में हल्का रूखापन झलकने लगता।
"क्या लगता है आपको,आप लोग बहुत अनुभवी हो गए हैं? कुछ बोली ला तो सुने के चाही न। 
आप लेकर के चिजों को आइए। जो मेरे आवश्यकता की होंगी उन्हें मैं उपयोग करूंगा। या वो रखी रहेंगी।" 
उनकी आवाज उतनी स्पष्ट नहीं थी जितनी वो सदैव हुआ करती हैं। थकान मिश्रित आवाज बहुत धीमी मगर तीखी थी। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर आए असहजता को भांपते में देर नहीं लगाई। 
ऐसा मत सोचिहे कि बाबा डाटत बड़न। बाबा बीमार हैं। हम तोहरा बहुत मानी ला। हमेशा से तु सबसे अलग दिखले, तुम्हारा स्वभाव सभी से अलग है।  फूआ के साथे रहीहे। 
फिर अचानक से बच्चों जैसी निष्छल मुस्कान उनके गालों पर प्रकट हुई जिसने उनकी सारी झुर्रियों को धुल दिया था। देख बाबा हंस देलन चल्ल... 
मैंने पहले कभी उन्हें इतना साधारण और निहत्था नहीं पाया था। मानों जैसे उन्होंने अपने सारे इच्छाओं का एक पल में समर्पण कर दिया हो। 
मैंने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया, अरे! नहीं बाबा ऐसा कुछ नईखे। आप आराम करिए। जो थोड़ा कुछ भी शरीर समेट रहा है आप बोलकर या गुस्सा करके सब खर्च कर दे रहे हैं। आप सोइए।
                               (बाबा वर्ष- 2016)


ऐसे हीं हंसत रहल कईली। 
पिताजी के याद हऊ? 

​मैं शायद इस अचानक आए प्रश्न के लिए तैयार नहीं था। भीतर कुछ टूटा, पर स्वयं को रोकते हुए भी मेरी जीभ से कुचले हुए वाक्यों के कुछ शब्द बाहर आ ही गए— "हां बाबा..." और फिर मैं मौन हो गया।


पिताजी का पूरा होना

​पिताजी का जिक्र होते ही मानो मैं भीतर तक पवित्र हो जाता हूं, और वही पवित्र जल आंखों के कोरों में इकट्ठा होने लगता है। मैंने किसी तरह स्वयं को संभाला।

हम उनका नाई बचा पईली। 
बहुत प्रयास किया मैं। बहुत हीं संतोषी और ईमानदार व्यक्ति था। ऐसा नहीं है कि मेरे सभी फैसले सही थे लेकिन मेरे बहुत से फैसलों पर कभी उसने शिकायत नहीं किया। वो भी हंसत रहत रहन। 
तु आराम कर् बाबा, वो कराहते हुए पिछे सरक रहे थे। मैं उन्हें सहारा दे रहा था। 
क्या बाबा के सामर्थ्य में था पिताजी को बचा पाना? 
नहीं, प्रारब्ध और नियती तमाम तकनीकी और चिकित्सीय शक्तियों से बड़ी होता हैं। लेकिन यह भी सच है कि हमने अपने जीवन के किसी भी संकट की घड़ी में सबसे पहले बाबा की ओर ही देखा है। मनुष्य कुछ ही पलों या क्षणों के लिए ही सही, किसी न किसी का 'ईश्वर' हुआ करता है। मनुष्य के भीतर के श्रेष्ठतम का प्रकाश पुंज ही तो उसे भगवान बनाता है—वह प्रकाश, जो सामने वाले के अंधकारमय जीवन में रोशनी बिखेर दे। यह दैवीय प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है, और मैंने समय-समय पर बाबा के भीतर इस प्रकाश को सबसे प्रखर रूप में देखा है। उसी प्रकाश से आलोकित होते हुए मैंने अपनों को और स्वयं को बढ़ते देखा है।
उनके संपन्न, सुसज्जित और गौरवान्वित वर्तमान से सभी थोड़ा टुकड़ा रखना चाहते थे। शायद यह हमारा आलस्य हो सकता है। जहां हम सदैव उनके प्रति इच्छित हीं रहे। कभी यह नहीं सोचा की उनकी हमसे क्या उम्मीद हो सकती है। अपनी नाकामयाबी से लेकर विपन्न वर्तमान के लिए हमारे प्रश्न उन्हें भेदते रहे। कहीं यहीं उनके मानसिक दुख का कारण तो नहीं?
मैं सदैव अपने लुलुपता भरे जीवन से उन्हें दूर रखने का प्रयास किया। अपनी इच्छाओं को उनके सहारे से पृथक रखने का प्रयास। 
हम जिससे प्रेम करते हैं उसके प्रति सम्मान स्वयं अपना स्थान बना लेता है। बाबा मेरे जीवन में उसी बरगद के भांति हैं जिसकी जड़ों से धवल श्रद्धा फूटती है। सुविचारों का जन्म होता है। जहां प्रेम के बदले प्रेम की इच्छा जन्म नहीं लेती। बदले की भावना नहीं भटकती। कुछ मिलने की उम्मीद में थोड़ा और देने का क्रम आगे बढ़ाया जा सकता है। 
शायद इसीलिए, इस विशाल बरगद के सामने मैंने अपने जीवन में एक 'गिलहरी' होना चुना है—जो अपने छोटे-छोटे प्रयासों से इस सेतु को बांधे रखना चाहती है।
बाबा अक्सर पूछा करते थे चार धाम कौन-कौन से हैं? चार वर्ण, चार आश्रम? 
मुझे वो सारे उत्तर आज भी याद हैं। 
वो प्रश्न क्यों पूछे गए थे इसका मर्म अब समझ आता है। वो सेवा और त्याग और समर्पण के बीज थे। 
रोशन के अंदर भी बहुत सेवा भाव है। 
हां बाबा, लेकिन वो भी अपने स्वास्थ्य से चिंतित हैं। 
उन्हें ठीक से नींद नहीं आ रही थी। कभी थकान, कभी घबराहट तो कभी कोई स्मृति उनके नींद में दखल दे रही थी। नींद जो हमारे कष्टों को भी थोड़ा आराम देती है लेकिन उनकी पीड़ा की लौ हमेशा उनके शरीर पर फड़फड़ा रही थी। 
क्या हुआ बाबा? 
बहुत आवाज आ रही है मशीनों की। 
उन्होंने बीते कुछ दिनों से अच्छी नींद ली थी। 
बीते सोमवार जब वो व्यायाम करने के लिए के.जी.एम.यू में आए थे तो अचानक से उनकी तबीयत बिगड़ गई। जिस कारण उन्हें तत्काल भर्ती करना पड़ा। 
रात के १० बजे के आसपास जब मैं उनसे मिलने भीतर गया तो दादा वहीं उनके समीप खड़े थे। नाक में आक्सीजन सपोर्ट के लिए नाजल कैनुला और बीपी मापने का कफ लगा हुआ था। ऊपर ऑसिलोस्कोप मॉनिटर में हरी रेखाएं तैर रहीं थीं। 
छोटू आया है, कानपुर से। 
बाबा पूरी तरह अचेत नहीं थे। मुझे देखते हीं शब्द उनके कांपते होंठों पर फड़फड़ाने लगे लेकिन बाहर कूदते उससे पहले वो मृत होकर होंठों के किनारे पर एकत्रित हुए जा रहे थे। 
मैं कुछ बोल नहीं पाया और बाहर आ गया। 

मैं अभी भी फूआ के साथ बाहर बरामदे में बैठा हूं। उसके छटपटाते हुए सवालों पर संतोष और संवेदना के थके हुए टुकड़े फेंके रहा था।  लंबी यात्रा करके मेरे जबाब भी कमजोर हो चुके हैं। वहीं बातें मैं बार-बार दुहराने लगा हूं। जैसे बाबा अपनी रोज की मौलिक चाहना बार-बार दुहरा रहे हैं। मैं हर बार फूआ के दुख को खरोंचे बिना वहां से निकलता आया हूं लेकिन आज यह असंभव लग रहा था। भीतर एक डर बैठा था.. मानों जो मैंने यहां से कदम बढ़ाया तो पहला कदम दुख को कुचलता हुआ निकलेगा। जहां सिर्फ भविष्य की चिंता होगा और बहुत से प्रश्न। 


अब हम निकलब फूआ। 

बाबा से मिल ले? 

पता नहीं,
मैं अपनी आत्मिक दरिद्रता और यह लाचारी बाबा को नहीं दिखाना चाहता था। लेकिन समाज में जीते हुए जिस सामाजिक प्रतिष्ठा को उन्होंने कमाया है, उसने उन्हें वह दिव्य दृष्टि प्रदान की है जिससे वे बिना कहे हर किसी की परिस्थिति और मजबूरी को भांप लेते हैं। वे हमेशा बातचीत में उतना खाली स्थान छोड़ देते हैं, जहां से सामने वाला आत्मसम्मान के साथ चुपके से निकल सके।

उन्होंने चश्मे को ठीक करने का प्रयास करते हुए कहा, "ठीक बा जा, हमार इ चश्मा थोड़ा ढीला हो गईल बा। चौराहे पर ABC चश्मा वाला है, वहां पर ये थोड़ा ठीक करावे के लिए किसी से बोल दीह।"
और रात में भोजन के साथ एक छोटा सा टुकड़ा लाल पेड़ा के भेज दीह। वो आर्या जी लेकर आए हैं। बहुत स्वादिष्ट होता है। बनारस का लाल पेड़ा। 

जी, लेकिन वो थोड़ा कठोर है बाबा। 

वो, आप उसकी छोटी-छोटी लड्डू जैसा बना देंगे तो वह अच्छा हो जाएगा खाने लायक, हल्का मुलायम।


जी बाबा, और मैं अपनी स्वार्थी आत्म-तृप्ति की भटकन में वहां से निकल पड़ा। ग्लानि, पश्चाताप और बेसब्री के आंसुओं से भीगा हुआ मैं... जो उस वक्त खुद को पूरी दुनिया से छुपा लेना चाहता था।



"कुछ दुखों पर हमें विश्वास हीं नहीं होता कि यह हमारे हिस्से का दुख है। वह हमारी कल्पना में दूर-दूर तक नहीं था। हमारी तैयारी भी नहीं होती। 
उस दुख के साथ हम जीना नहीं चाहते पर फिर भी उसका एक  टुकड़ा हमें जिंदा रखता है। हृदय में थोड़ा संतोष उत्पन्न करता है। इस प्रकार का दुख बहुत हीं स्वार्थी और निर्मल होता है। बाबा को इस कष्ट के साथ देखना उसी दुख में संतोष और संभावना ढूंढने जैसा है। मैं जानता हूं अपने तमाम प्रयासों के बाद भी
भविष्य में अपने इन स्मृतियों को अतीत से बाहर नहीं नोच पाऊंगा। वो कहीं एकत्रित हुआ बैठा रहेगा।"

​"और दुख... यूँ ही सदैव भूत, भविष्य और वर्तमान के हर क्षण में स्वयं को तटस्थता से उपस्थित रखेगा। वह हमारी उदासी और अतृप्ति को देख, अपने इस अनंत विस्तार को सम्मान देगा।

​वह दुख, जो सबसे बड़ा है।

हिमालय की सबसे ऊँची चोटी से भी विशाल,

किसी कठोरतम पर्वत से भी दृढ़,

और बंजर रेगिस्तान से भी अधिक तपता हुआ।

गहरे समुद्र से भी अधिक खारा।

​वह गंगा की शुद्धता से भी पवित्र है,

मुझसे भी बड़ा है और तुमसे भी बड़ा।

वह मंदिर की भव्यता से भी ऊँचा है,

और उसमें बैठे उस भगवान से भी...

यहाँ तक कि उस बरगद से भी विशाल है, जिसकी तुलना मैं 'बाबा' से करता हूँ।

​वह बड़ा है... सचमुच, दुख सबसे बड़ा है,

मृत्यु के अंधकार से भी अधिक गहरा।"


पुनश्च
दिनांक - ३०-०७-२०२६

मैं अस्पताल में था। बाहर बरामदे में बैठा इंतजार कर रहा था। इंतजार अपनी बारी आने का, बाबा के स्वस्थ हो जाने का। आशिर्वाद प्राप्ति की लालसा में या किसी अदृश्य आत्म तृप्ति के लिए।
बीते रविवार चुन्नु भैया का रात्रि में फोन आया कि बाबा की तबीयत अचानक से अस्थिरता आ गई है। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। उनकी सांस उनकी जीवन की यात्रा को नाप रही है। उस यात्रा में सांस बार-बार थक जा रही है। बाबा बहुत आगे निकल जा रहे हैं और सांस का दम फूलने लग रहा है। हमारी प्रार्थना और डाक्टर का उपचार उन्हें उस दुनिया से खींचकर इस दुनिया में लाने का प्रयास कर रहे हैं। जहां हमारा इंतजार है, हमारी आशा है। हम अपने इच्छा से भरे अपूर्ण संसार में उनकी प्रतिक्षा कर रहे हैं। जहां उनके आते हीं हमारा खोखलापन थोड़ा भर जाएगा। जीवन थोड़ा और सुंदर हो जाएगा। मैं रात नींद के लिए रात से  लड़ता रहा और सुबह काम पर निकल गया। वहां मेरी उपस्थिति अनिवार्य थी लेकिन शाम होते तक मैंने अपने सिनियर को यह जानकारी दे दी कि मुझे कभी भी जाना पड़ सकता है। 

कहां? 

स्थान के जबाब में वह लखनऊ तो था। लेकिन ठीक-ठीक कहां पहुंचना है उसके लिए मेरे पास अब भी उत्तर नहीं है। 
क्यों के उत्तर में तो मैं पूरी तरह खाली हूं। 
बस मैं पहुंचना चाहता हूं। अगर गिद्ध के पास मानविय गुण होते शायद वह मेरी तरह होता। या मैं अपने मानवीय मूल्यों से लदा हुआ गिद्ध हूं। 
जो वहां पहुंचना चाहता था। कि अतीत के स्मृतियों का दरवाजा जब भी कोई भविष्य में खटखटाए तो उसके खुलते हीं मैं वहां मिलूं। 

"इस क्रूर सत्य के साथ कि मैं बाबा के स्वास्थ्य को बेहतर नहीं कर सकता, बस उन्हें असहाय सा देख सकता हूँ।"

पहली बार मैं उन्हें दूर से देखकर वापस लौट आया। खिड़की के दूसरी ओर से वो और भी कमजोर लग रहे थे। बीते सप्ताह में मानों उनकी देह तेजी से बूढ़ी होने लगी थी। 
जैसे उनका एक कदम चलना १०० कदम चलने के बराबर हो। और उन्हें इसका आभास हीं ना हुआ हो कि वह इतना आगे बढ़ चुके हैं। बहुत आगे जहां अस्पताल की शांति में मशीनों का शोर तड़प रहा है। जहां जीवन कृत्रिम मशीनों द्वारा संचालित हो रहा है। उनका वर्तमान समय बहुत संकिर्ण हो गया है जहां अब बहुत हीं महत्वपूर्ण चिजों को लेकर हीं आगे बढ़ा जा सकता है। उस संकरे वर्तमान में किसी का उनके स्वभाव को पूरा पकड़ पाना भी मुश्किल है। वहां सिर्फ कमजोर सांसे तैर सकती हैं और कुछ फूसफूसाहट भरे अधूरे शब्द सफर कर सकते हैं।
                 (पंडित निर्मल वर्मा जी की पुस्तक से)


मैं इतना साहस नहीं जुटा पाया कि उनके सम्मुख खड़ा हो सकूं। मैं अपने सजल आंखों के साथ उनके समक्ष नहीं जाना चाहता था, ना हीं मुझमें इतना साहस था कि मैं उनकी धुंधली चेतना में अपने होने का कंकड़ फेंककर कहूं कि, मैं हूं बाबा। 
मैं वापस बाहर आ गया। बरामदे की भीड़ को रात होने का अहसास धीरे-धीरे निगलते जा रहा था। 
जब मेरे आंसू के सभी निशान मिट गए थोड़ी देर के बाद पुनः अवधेश भैया से कहा कि भैया मैं मिलना चाहता हूं। उनकी अचेत को व्याकुल करने के लिए नहीं। स्वयं का परिचय दिए बगैर मैं वहां खड़ा होना चाहता था। 
काहे मिले नई क्या? गए तो थे? 

नहीं, मैं नहीं मिल पाया मुझे मिलना है। 
हम साथ गए। बाबा की आंखें आधी बंद थीं। मुझे देखते हीं उन्होंने पास बुलाने का इसारा करना आरंभ किया। मुझे लगा उन्हें कुछ तकलीफ है और मैं उनके हाथ को पकड़ने का प्रयास करने लगा। उन्होंने उसे छुड़ाते हुए और करीब बुलाया और पीठ पर हाथ फेरने लगे। फिर इसारे में पूछा खाना खाया की नहीं? 
और बताया कि मैं ठीक हूं। वह ऊर्जा असाधारण थी। उनका प्रेम शारिरिक अक्षमता को रौंदता हुआ मुझ तक पहुंच रहा था। कोई आधुनिक यंत्र उसे किसी पैमाने में नहीं समेट सकता। अपनी अस्वस्थता में भी मेरे स्वस्थ होने की लालसा से वो मुक्त नहीं हो पाए। उनका औदार्य होना उनके व्यवहार में झलक उठा। मेरे मास्क ना होने पर उन्होंने आपत्ति जताई,  उनके दाएं आंख के कोने में आंसू की एक बूंद अटकी हुई थी। 
लंबी चुप्पी, संवाद के इंतजार में तड़फड़ाती हुई हमारे बीच मर रही थी। मैंने उस चुप्पी के, मृत्यु से ठीक पहले बाबा से कहा आप ठीक हो जाएंगे बाबा। उनका सिर हिला और चुप्पी को थोड़ा जीवन मिला। उन्होंने संकेत किया सोनी को बुला दो।


मुंह में नलियां पड़े होने के कारण वो बोलने में असमर्थ हैं। अपनी सारी चैतन्यता के मध्य हवा का अवरोध उनके वर्तमान को कुतर रहा है। वो अपने संबंधियों को सचेत नहीं कर रहे आस्वस्त कर रहे हैं कि जीवन को ऐसे हीं जिया जाता है। जीवन के उस पार ऐसे हीं इत्मिनान और तसल्ली से पहुंचा जाता है। 

मानों जैसे कह रहे हों... ... तुम बहुत अच्छे लड़के हो। तुम्हें जीवन अच्छे से जीना चाहिए। 
इतना दुख देखने के बाद जीवन दूसरे तरीके से जीना चाहिए। 

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एक ठहरी हुई प्रार्थना

आज, जब वे अस्पताल के उस नीरस कमरे में लेटे हैं, तो दिल के किसी कोने में एक अजीब सी उदासी और कृतज्ञता एक साथ तैर रही है। वे उस पीढ़ी के आख़िरी कुछ पत्तों में से हैं, जिनकी छांव में बैठना मुझे सुरक्षित रखता था। ठीक-ठीक बरगद
आपका मुस्कुराता हुआ चेहरा, वह निश्छल वात्सल्य एवं गर्व और अनुशासन से सनी हुई अनुभव की वह महक जो आपके आस-पास हमेशा रहती है, जो कभी इत्र की सुंगध सी महसूस होती थी। अब वह जीवन का सुवासित कर रही है। मेरे लिए सबसे बड़ी पूँजी है।
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अंतिम प्रतिरोध 


            (गजल- रात ढ़लती नहीं दिन गुजरता नहीं)

उपचाराधीन अवस्था में अस्पताल में बीतते दिनों में मुँह में लगी नलियाँ शब्द छीन चुकी हैं, मशीनों के शोर ने बहुत से जरूरी शब्दों को निगल लिया है। तब बाबा अपनी जरूरतों को लिखकर बता रहे हैं। उन्होंने एक ग़ज़ल सुनने की इच्छा जताई है। 
कागज़ पर खिंची वे आड़ी-तिरछी, कांपती हुई रेखाएँ केवल अक्षर नहीं हैं। भारी संघर्ष और प्रतिरोध हैं। रात और दिन के मध्य तीरती एक थकती यात्रा।
                                  (वर्ष-2017)

जिस व्यक्ति ने जीवन भर विचारों और अनुभूतियों को सहजता से शब्द दिए हों, आज उसके लिए एक-एक अक्षर उकेरना किसी पहाड़ को लांघने जैसा था। 
बाबा को मैंने लंबे समय से प्रतिदिन डायरी लिखते देखा है। सुंदर अक्षरों से उनके आसपास का हर पन्ना सजा रहता था। आज कांपते हाथों से खींची गई वे रेखाएँ बता रही थीं कि देह भले ही जवाब दे रही हो, लेकिन भीतर अब भी कुछ चैतन्य है। 
                     (पन्नों पर अंतिम दिनों का संघर्ष)


मैं इन पन्नों को देखता हूँ तो मुझे लगता है कि यह उनकी लिखावट नहीं, बल्कि समय के पृष्ठ पर उकेरा गया उनका अंतिम प्रतिरोध है। एक ऐसा प्रतिरोध, जो बीमारी और अक्षमता के सामने घुटने टेकने से इनकार करता है। वे शब्द भले ही अक्षरों के रूप में धुंधला रहे हों, लेकिन उनकी अर्थ-ध्वनि बिल्कुल स्पष्ट है। अभी वहां आशा है.... जीवन भी।


अंतिम यात्रा 
                                   (वर्ष-2016)

"मैं ठीक हूँ।"
इस एक वाक्य के सहारे, किसी को भी एक लंबे समय तक निश्चिंत रखा जा सकता है।
पीड़ा में पगे इस छोटे से झूठ से, इंसान अपनों को अपने यथार्थ के ताप से बचाए रखता है।
मृत्यु की आशंका और उसके भयावह आगमन से, वह अपने तमाम आत्मीय जन को मुक्त कर देता है।
"मैं ठीक हूँ" का यह वर्तमान, हर बार मृत्यु की छाया को पीछे धकेलकर, जीवन की एक नई उम्मीद को रचता है।
और मृत्यु...
मृत्यु भी तो अंततः ऐसे ही आती है, जिसके हिस्से में केवल साँसों का मौन हो जाना लिखा है।
पर उस मौन को सहजता से स्वीकार पाना सबसे कठिन है...
क्योंकि ठीक उसी क्षण, "मैं ठीक हूँ" की स्मृतियाँ कानों में फुसफुसाने लगती हैं।
"मैं ठीक हूँ"... मृत्यु-पथ पर बढ़ा पहला कदम है।
जहां स्मृतियां वास्तविकता का सामना करने में लड़खड़ाती हैं।


दूसरी दुनिया में बस जाने वाले लोगों का सुख और दुख भला कहाँ रहता है?
                      (पुष्पांजलि अर्पित छाया चित्र)

मृत लोगों का सुख और दुख भला कहाँ रहता है?
​न वह किसी भूगोल का हिस्सा है, न ही हमारे वर्तमान का कोई अंश। वह तो अतीत का एक ऐसा यथार्थ है, जिसकी कल्पना कभी हमारे भविष्य के पवित्र क्षणों को रचती है, तो कभी हमारे वर्तमान को चुपचाप खरोंच देती है।
​वह रहता है हमारी जीवित स्मृतियों की धूल और धूप से काँपती दरारों में—जहाँ बीता हुआ कल (धूल) और आने वाला कल (धूप) एक-दूसरे का हाथ थामे शांत खड़े रहते हैं।
​और जब स्मृतियों को सहलाता कोई आँसू छलक पड़ता है, तो हम यह तय भी नहीं कर पाते कि यह सुख का आँसू है या दुख का।

​मृत लोगों का सुख और दुख हमारे आँसुओं में बसता है—जो समय के लंबे रास्ते पर सुबकता हुआ भी बचा रह जाता है। हमारे जीवित रहने तक उसका कुछ अंश हमारे भीतर यूँ ही छूटा रहता है।


               (पिछले वर्ष निजी विद्यालय पर १५ अगस्त                                       स्वतंत्रता दिवस समारोह की है।)

जब कोई व्यक्ति हमारे बीच से दूर जाता है, हमसे बिछड़ता है, तो वह केवल एक खालीपन छोड़कर नहीं जाता आंसूओं का खारा समुद्र हीं हमारे लिए नहीं छोड़ता। वह अपने पीछे अपने व्यक्तित्व के विस्तार जितनी जगह छोड़ जाता है। अपने गौरव, अपने विचार और अपने संघर्ष का पूरा स्थान छोड़ जाता है।
मेरा ऐसा मानना है कि जब कोई महान व्यक्तित्व हमारे जीवन या समाज के बीच से विदा लेता है, तो अपनी पूरी महानता, अपना सारा संघर्ष, अपनी पूरी चेतना और अपने विचार यहीं हमारे पास, इसी मिट्टी में छोड़कर जाता है।
मेरे बाबा, पूज्य (स्व.) श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी जी भी जब इस नश्वर संसार से विदा हुए, तो वह अपने पीछे अपनी स्मृतियों, संघर्षों और मूल्यों का एक ऐसा असीम विस्तार छोड़ गए हैं, जो हर क्षण हमारे भीतर उनके होने का अहसास कराता रहेगा और हमारे मार्ग को प्रकाशित करता रहेगा।


Saturday, July 18, 2026

तुम्हें इस रंग से भय हो जाएगा- पीयूष चतुर्वेदी

तुमने आज केवल निशान छोड़े हैं।
निशान चोट के नहीं...
अपनी संवेदनहीनता के,
स्वयं की क्रूरता के,
और उस अनैतिक व्यवस्था के जिसमें संवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।
मौलिक अधिकारों को कुचलने के कुछ रंग छोड़े हैं तुमने हमारी देह पर।

आत्मा की चोट इससे अलग है।
उस चोट में तुम्हारी राजनीति का रंग नहीं है,
वहाँ संघर्ष का रंग है,
राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता की अपनी ज़िम्मेदारी है,
और घर वालों के सपनों का वह टुकड़ा है जिसने अब तक हमारे सब्र को सँभाल रखा था—
अपने स्वप्निल भविष्य की एक आस।

यह जो धैर्य टूटा है, वह तुम्हारे लंबे समय से फैलाए व्यवस्थित और सुनियोजित झूठ का परिणाम है।
और जो आक्रोश अब बह निकला है, उसे तुम्हारे इस सरकारी तंत्र और लाठियों का बाँध कभी रोक नहीं पाएगा।
वह और तेज़ बहेगा... तुम्हें बहा ले जाएगा,
तुम्हारी सत्ता को रसातल में डुबो देगा!
फिर तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी उन्हीं जन-मुद्दों की, जिन्हें सुनने से तुम्हारे कान कतराते हैं—
तुम, जो जनता की हर ज़रूरत और अधिकार को षड्यंत्र की दृष्टि से देखते हो।

ये महज़ चोटें नहीं हैं...
जैसे वोट का निशान अधिकार दर्शाता है,ये अधिकार माँगने के निशान हैं।
अंग अनिश्चित हैं,
पर रंग निश्चित है—लाल।
तुम्हें इस रंग से भय हो जाएगा!
तुम्हें जो कलम आज बन्दूक लग रही है तुम्हारे तोपों से कहीं बड़ी है।
तुम अब डरोगे लुभावने चुनावी नारे लिखने से।
तुम हटा देना इस रंग को किताबों से...
तुम्हारी सत्ता के लिए यह सरल है, और संभव भी।
असंभव है तो बस तुम्हारे लिए—जनता को 'जनता' समझना।





तुम परेशान हुए बैठे हो कि यह निरंकुश और अमानवीय सरकार है। जहां व्यक्ति के मौलिकताओं का पतन हो रहा है। अरे! अब बात भारत की नहीं रही। अब बात विश्वगुरु की हो गई है। जिस देश की वित्त मंत्री महंगाई के सवाल पर यह कहे कि मैं लहसुन प्याज नहीं खाती। परिवहन मंत्री कहे मैं पेट्रोल वाली गाड़ी में नहीं चलाता। पर्यावरण मंत्री कह बैठे किसी रोज कि मैं आक्सीजन नहीं लेता। वहां तुम शिक्षामंत्री के पिछे खाना छोड़कर पड़े हुए हो। किताब की इतनी बड़ी-बड़ी बातें और मानवीय मूल्य याद हैं। अपनी जीजिविषा का स्मरण है। अपने शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पगलाए हुए हो। भविष्य की कामना लिए चायवाले को उंगली दिखा रहे हो। लेकिन यह भूल गए कि विश्वगुरु देश के प्रधान सेवक शिरोमणि नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने कहा था कि किसी को भूख से नहीं मरने दूंगा। अब तुम कहो कि यह भी तो कहा था का ना खाऊंगा ना खाने दूंगा? हां, तो भैया नवरात्रि में वो नहीं खाए और २० दिन से तुम। और वो भी अपनी मर्जी से। उन्होंने तो तुम्हें रोका भी नहीं। कोई गरीब भूखा नहीं मरेगा.. और आप तो सफल व्यक्ति हो भैया, इसी क्रम में उन्होंने देश में मुफ्त राशन भी बाटे। 80 करोड़ गरीब जनता का पेट भरा। फिर तुम्हें उठाकर खाना ठूसवाने ले गए तो तुम्हारे पेट दर्द कर रहे हैं? तुम्हीं तो भगत सिंह की तस्वीरें लहरा रहे थे प्रदर्शन के दौरान। उनकी भी भूख-हड़ताल जबरजस्ती तोड़ी गई थी। उन्हें भारत देश में फांसी दिया गया था। 
तुम फांसी तक रूके रहो। 
तुम फांसी तक खाते रहो। 
तुम फांसी तक चुप रहो। 
तुमने स्वयं को गांधी का अनुयाई बताया है.. सत्याग्रह का पालन किया है। 
तुम गोड़से के आने तक खाते पीते रहो। 
भजन गा सको तो वो भी गाओ.. शायद वो जल्दी पहुंचे। 
तुम्हें इस अन्न के बाद गोली खानी है। 
तुम्हें फांसी चढ़ना है। 
तुम अभी से बौखला गए?

Tuesday, April 21, 2026

हम तोहर पुजारी बाबा,हम तोहर पूजन करिछै

सभी की उंगलियों में छटपटाहट थी। लगभग सभी होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे। वो पूरे नहीं खुलते। बंद भी नहीं होते। मात्र उतने हीं जिसमें उसके समीप खड़े व्यक्ति के कानों तक शब्द अगर कूदना भी चाहें तो वहां पहुंचने से पहले वो कमजोर शब्द गूंगे हो जाएं। कौन सुन रहा है इस बुदबुदाहट को? बोलने वाला या कोई इष्ट देव जिसके लिए सभी यहां पहुंचे हैं। इस अप्रैल की निर्दयी धूप में बच्चे, बूढ़े, स्वस्थ, अस्वस्थ, महिलाएं सभी किस उम्मीद में अपने आप को आगे खींच रहे हैं? वहां जहां एक चमकदार काला पत्थर है...जो अविनाशी है। जो शिव है।

जिसके त्रास से सभी सुरक्षा चाहते हैं। जहां फूलों, बेलपत्रों,धतूरा का अंबार लगा है। एक व्यक्ति उस ढ़ेर से लगातार युद्ध लड़ रहा है। जब तक वो उन्हें पूरा हटा नहीं देता। इस संघर्ष के बाद भी वहां कुछ अंश शेष रह जाते हैं। और यह निरंतरता बनी रहती है। जल और दूध के अभिषेक से डूबता शिवलिंग क्या ऐसे हीं छिपता जा रहा है? या श्रद्धालुओं की दुख.. पीड़ा.. को निगलता हुआ उन्हें भवसागर के पार लगा रहा है? उनकी तकलीफों को सोख रहा है? ये फूल जो उसके दुख हैं जिसे कोई पुजारी नोच रहा है? 
कोई उस पीड़ा को नहीं पकड़ सकता जो हृदय की भूमि पर फड़फड़ा रही है। कोई पंडित,पीर,बाबा, संन्यासी, पैगंबर कोई भी नहीं। सभी की अपनी यात्राएं है। 
जैसे मां गंगा की अपनी यात्रा है। गोमुख से गंगासागर तक। मानव देह को पोषित करना ना कि उनके पाप को धोना। कुछ हद तक मैल को निचोड़ना ज्यादा प्रासंगिक लगता है।
क्या ऐसा करते हीं दुख भक्त के जीवन से झर जाती है? या कोई उम्मीद बनी रहती है उसके नष्ट होने की जिसके सहारे जीवन थोड़ा सरल मालूम पड़ता है? क्या यहां हर व्यक्ति अपने अवसाद को ढ़ोता हुआ पहुंचा है? 
नहीं,यहां सभी आए हैं। संसार के संपन्न से विपन्न तक सभी। हर वर्ग के लोग। हर जाति और आय वर्ग के लोग भी। यहां आना सिर्फ अपनी उम्मीद की पूर्ति हेतु नहीं है। 
वो क्या है जो करबद्ध निवेदन में उंगलियों पर कांप रहा है? उम्मीद..या आशा.. ये दोनों हीं नहीं है। ये उन दोनों के बीच का कुछ है। आस्था की एक बहुत महिन लकीर जैसा जहां से श्रद्धा फूटती है। उस श्रद्धा में मांगना नहीं होता। विश्वास की भूख भी नहीं होती। मात्र शांति होती है। शांति जिसके सहारे जीवन के कुछ दिन और आगे ढकेला जा सकता है। एक नैतिक भय का पूर्नजन्म जिसकी उपस्थिति में मानवता के मूल्यों का अहसास हमें खोखला नहीं होने देता। जिसके मौजूदगी में हम ठीक-ठीक मनुष्य बनेंगे की नहीं के उत्तर में ठीक-ठाक जीव बनने की उम्मीद बनी रहती है। सरलता,सदाचार और शिष्टता को स्वीकार करता। जो हममें दया का बीज बोता है। 
नास्तिकता और आस्तिकता के बीच यदि कोई तार्किक होना भी चुनता है तो वह नैतिक मूल्यों को नहीं नकार सकता। परमेश्वर जो काल्पनिक है या नहीं के उत्तर में यथार्थ हमें नैतिक कर्तव्यों से जोड़ता है। जहां आस्तिकता के भाव को थोड़ा और मजबूत करता है। वहीं नास्तिकता की दीवार में हल्का सुराख करता हुआ मनुष्य को तार्किक बनाता है। विचारों को रोपते हुए जीव यह जानते हैं कि रास्ता इतना सरल नहीं। कर्मों से मुक्ति इतनी आसान नहीं। यह भजन और भाव से कहीं ऊपर इसका उत्तर है। जहां मृत्युंजय कुंड का जल भी कृत्य को नहीं धुल सकता। इसका कहीं दूर .. बहुत दूर जहां सिर्फ माफी और भक्ति से उपजी धर्मी पथ पर भटकना हीं एक मात्र साधन है। भजन की थिरकन से उपजी सौम्यता हीं इसे सहेज सकती है। इसी रास्ते चलता हुआ जहां सारा कुछ छुटता जाएगा.. और अंत में जो प्राप्त होगा.. जहां कमजोर सुख हमारी देंह से झर जाएगा जो सभी का सुख नहीं है। वहां सभी के दुख एक हो जाएंगे। अंतिम दुख जो सभी का है। ठीक वहीं सारा कुछ प्राप्त होगा। वहां आप नास्तिक है, आस्तिक या बहुत बड़े तार्किक कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां आप मीठा सा मैथिली भजन गा सकते हैं जो बिहार से आए श्रद्धालु लयबद्ध तरीके से गाए जा रहे थे। जहां भीतर जड़ित पहाड़ से एक सोता फूटा है।

हम तोहर पुजारी बाबा,
हम तोहर पूजन करिछै।
हो... हम तोहर वंदन करिछै,
हम तोहर सेवा करिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...

किएक फूल लोढ़ब, किया हार बनायब,
चरण कमल में तोहर चढ़ायब।
भक्ति भाव सँ दीप जरायब,
निशिदिन नाम रटैत रहिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...

मन के मंदिर में तोरा बैसायब,
अश्रु जल सँ चरण पखारब।
दुख-दारिद्र सब दूर हटाबह,
ईहे अरज हम नित करिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...
या उस वृद्ध महिला की तरह जो गौरी केदारेश्वर मंदिर में अपनी पीड़ा को रथयात्रा की पालकी का स्पर्श करा नष्ट कर रहीं थी। मानों वह पालकी उठाने का उपक्रम कर रही हो। जिसकी उम्र उसके सौंदर्य और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को निगल लिया था। लेकिन श्रद्धा का बीज उसके जीवन को आलोकित कर रहा है। 
शायद यहीं कारण है कि भक्ति भाव में डूबे शहर वाराणसी जो आध्यात्मिक राष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी है। वहां के सुप्रसिद्ध मंदिर संकटमोचन के भूतपूर्व महंत स्वर्गीय श्री वीरभद्र मिश्रा जी बी.एच.यू. जैसी प्रतिष्ठित संस्थान के सीविल विभाग के विभागाध्यक्ष थे। आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान का यह सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। 

Tuesday, March 24, 2026

बरगद और बाबा


(पंडित जय प्रकाश चतुर्वेदी, पूर्व संगठन मंत्री एवं पूर्व सदस्य विधान परिषद-भारतीय जनता पार्टी)



बाबा की लकीरें 

पैर जब ज़मीन पर पड़ते हैं, तो वे सिर्फ चलते नहीं,
बीते हुए पल की लाचारी को कुचलते हैं। 
खांसी को लगभग चबाते हुए उस व्याकुलता को मिटा देते हैं।
पगथलियों की झुरमुराती रेखाओं में (जो अब बहुत गाढ़ी और गहरी होती जा रही हैं) जमी उसकी उपस्थिति को दूबारा झाड़ने के क्रम में वह उसे बार-बार फर्स का स्पर्श भेंट करते हैं। 
वह जो खाँसी का तूफ़ान अभी गुज़रा है,
उसे उन्होंने पतली कसती हुई हिम्मत से शांत कर दिया है। 
उनके हाथ नहीं काँपते— वहां अभी उंगलियों पर पीड़ा नहीं नाचती।
क्योंकि उन हाथों में उनके पूरे वजूद की पकड़ और संघर्ष का लेखा-जोखा है।
"मैं ठीक हूँ"
यह शब्द नहीं, एक अभेद्य किला है, और उनका धैर्य उनकी सैन्य शक्ति।
जिसे उन्होंने अपनी कमज़ोरी के चारों तरफ़ खड़ा कर दिया है।
ताकि बाहर खड़े अपनों को,
उनकी ढहती हुई दीवारों की दरारें न दिखें। 
कोई उन दरारों से भीतर झांकता हुआ उनके विश्वास और सजी हुई सफल यात्रा को ना कुरेद सके।
जैसे बरगद अपनी लटकती जटाओं से,
खुद को फिर से ज़मीन में गाड़ लेता है,
बाबा भी अपनी हर गहरी साँस से,
जीवन को एक बार फिर ज़मीन से पकड़ रहे हैं।
उनके लिए ठीक कुछ समय पहले पनपा बलगम का ज्वार अतीत की परछाई है जो उन्हें पीछे खींचती है,
पर उनका 'निर्भिकता' एक प्रकाश पुंज है—
वह उस अंधेरे को चिरते हुए हर बार वर्तमान पर कूद जाते है। 
साहस और आत्मविश्वास के साथ और कहते हैं मैं ठीक हूं।

मानों कूदने से हीं सब ठीक हो जाएगा।



कितनी हिम्मत जुटानी होती है यह कहने में कि मैं ठीक हूं?
अभी तो मैं बेहतर हूं।
वो अभी जो इस समय मौजूद है उसमें कुछ देर पहले की थकान शामिल नहीं हुई है। 
अभी से ठीक पहले खांसी के तेज तूफ़ान ने उन्हें थोड़ा और कमजोर किया था। 
कमजोरी से जन्मे थकान ने उनकी आवाज को और कमजोर किया।
लेकिन अपने ठीले होते जा रहे पजामें को जहां अब बहुत जगह बनती जा रही है..व्यवस्थित करते हुए गहरी सांस अंदर लिया। बाबा ने लंबी सी साँस खींची-और उस एक साँस में बीते पल की उपजी थकान सिमट आई।
सांस की आवाज को अपने पैरों की आवाज से शांत करते हुए। उसे पूरी तरह सूखा देने के बाद उन्होंने फिर दुहराया.. 
अभी तो मैं ठीक हूं। बेहतर हूं पहले से। 
उन्होंने अपने पैरों से उठी धुन में सारी थकान, शारीरिक कष्ट और स्वास्थ्य हानि को झाड़ दिया।
वर्तमान की दृढ़ता ने बीते पलों को मानों धुल दिया हो। 
इस बारंबारता में सिकुड़न लिए धीमा होता वर्तमान अतीत को बहुत पिछे ढ़केलता हुआ आगे बढ़ रहा है।
उनके वर्तमान में वो बिल्कुल ठीक हैं। अपनी मौलिकता में अपने अतीत की परछाई को संयम और धैर्य के प्रकाश से चीरते हुए।

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