कोई उस पीड़ा को नहीं पकड़ सकता जो हृदय की भूमि पर फड़फड़ा रही है। कोई पंडित,पीर,बाबा, संन्यासी, पैगंबर कोई भी नहीं। सभी की अपनी यात्राएं है।
जैसे मां गंगा की अपनी यात्रा है। मानव देह को पोषित करना ना कि उनके पाप को धोना। कुछ हद तक मैल को निचोड़ना ज्यादा प्रासंगिक लगता है।
क्या ऐसा करते हीं दुख भक्त के जीवन से झर जाती है? या कोई उम्मीद बनी रहती है उसके नष्ट होने की जिसके सहारे जीवन थोड़ा सरल मालूम पड़ता है? क्या यहां हर व्यक्ति अपने अवसाद को ढ़ोता हुआ पहुंचा है?
नहीं,यहां सभी आए हैं। संसार के संपन्न से विपन्न तक सभी। हर वर्ग के लोग। हर जाति और आय वर्ग के लोग भी। यहां आना सिर्फ अपनी उम्मीद की पूर्ति हेतु नहीं है।
वो क्या है जो करबद्ध निवेदन में उंगलियों पर कांप रहा है? उम्मीद..या आशा.. ये दोनों हीं नहीं है। ये उन दोनों के बीच का कुछ है। आस्था की एक बहुत महिन लकीर जैसा जहां से श्रद्धा फूटती है। उस श्रद्धा में मांगना नहीं होता। विश्वास की भूख भी नहीं होती। मात्र शांति होती है। शांति जिसके सहारे जीवन के कुछ दिन और आगे ढकेला जा सकता है। एक नैतिक भय का पूर्नजन्म जिसकी उपस्थिति में मानवता के मूल्यों का अहसास हमें खोखला नहीं होने देता। जिसके मौजूदगी में हम ठीक-ठीक मनुष्य बनेंगे की नहीं के उत्तर में ठीक-ठाक जीव बनने की उम्मीद बनी रहती है। सरलता,सदाचार और शिष्टता को स्वीकार करता। जो हममें दया का बीज बोता है।
नास्तिकता और आस्तिकता के बीच यदि कोई तार्किक होना भी चुनता है तो वह नैतिक मूल्यों को नहीं नकार सकता। परमेश्वर जो काल्पनिक है या नहीं के उत्तर में यथार्थ हमें नैतिक कर्तव्यों से जोड़ता है। जहां आस्तिकता के भाव को थोड़ा और मजबूत करता है। वहीं नास्तिकता की दीवार में हल्का सुराख करता हुआ मनुष्य को तार्किक बनाता है। विचारों को रोपते हुए जीव यह जानते हैं कि रास्ता इतना सरल नहीं। कर्मों से मुक्ति इतनी आसान नहीं। यह भजन और भाव से कहीं ऊपर इसका उत्तर है। जहां मृत्युंजय कुंड का जल भी कृत्य को नहीं धुल सकता। इसका कहीं दूर .. बहुत दूर जहां सिर्फ माफी और भक्ति से उपजी धर्मी पथ पर भटकना हीं एक मात्र साधन है। भजन की थिरकन से उपजी सौम्यता हीं इसे सहेज सकती है। इसी रास्ते चलता हुआ जहां सारा कुछ छुटता जाएगा.. और अंत में जो प्राप्त होगा.. जहां कमजोर सुख हमारी देंह से झर जाएगा जो सभी का सुख नहीं है। वहां सभी के दुख एक हो जाएंगे। अंतिम दुख जो सभी का है। ठीक वहीं सारा कुछ प्राप्त होगा। वहां आप नास्तिक है, आस्तिक या बहुत बड़े तार्किक कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां आप मीठा सा मैथिली भजन गा सकते हैं जो बिहार से आए श्रद्धालु लयबद्ध तरीके से गाए जा रहे थे। जहां भीतर जड़ित पहाड़ से एक सोता फूटा है।
हम तोहर पुजारी बाबा,
हम तोहर पूजन करिछै।
हो... हम तोहर वंदन करिछै,
हम तोहर सेवा करिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...
किएक फूल लोढ़ब, किया हार बनायब,
चरण कमल में तोहर चढ़ायब।
भक्ति भाव सँ दीप जरायब,
निशिदिन नाम रटैत रहिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...
मन के मंदिर में तोरा बैसायब,
अश्रु जल सँ चरण पखारब।
दुख-दारिद्र सब दूर हटाबह,
ईहे अरज हम नित करिछै।
हम तोहर पुजारी बाबा...
या उस वृद्ध महिला की तरह जो गौरी केदारेश्वर मंदिर में अपनी पीड़ा को रथयात्रा की पालकी का स्पर्श करा नष्ट कर रहीं थी। मानों वह पालकी उठाने का उपक्रम कर रही हो। जिसकी उम्र उसके सौंदर्य और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को निगल लिया था। लेकिन श्रद्धा का बीज उसके जीवन को आलोकित कर रहा है।
शायद यहीं कारण है कि भक्ति भाव में डूबे शहर वाराणसी जो आध्यात्मिक राष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी है। वहां के सुप्रसिद्ध मंदिर संकटमोचन के भूतपूर्व महंत स्वर्गीय श्री वीरभद्र मिश्रा जी बी.एच.यू. जैसी प्रतिष्ठित संस्थान के सीविल विभाग के विभागाध्यक्ष थे। आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान का यह सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है।
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