सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Saturday, August 29, 2026

पिताजी की हत्या

सुबह का समय। पंछियाँ कलरव कर रही थीं। मंदिर के हर कोने से उठती घंटे की आवाज़ सभी दर्शनार्थियों को श्रद्धा से भर रही थी। रंग-बिरंगे फूल भगवान शिव के चरणों में समर्पित शिवलिंग की शोभा बढ़ा रहे थे। सभी आगंतुक भक्ति-भाव और विश्वास में डूबे भगवान के आगे नतमस्तक थे।
वहीं एक 17 वर्ष का साधारण-सा लड़का था, जो अपने भीतर डर को बसाए, भक्ति का झूठा चोला पहने दो पंडितों के सानिध्य में तेज मंत्रोच्चारण के उद्घोष के बीच शिवलिंग पर कांपते हाथों से पतली धार बनाकर गोरस का अभिषेक कर रहा था। शायद वह अभिषेक कर नहीं रहा था, उससे कराया जा रहा था। उस अभिषेक में सिर्फ गंगाजल और गाय का दूध शामिल नहीं था, उसमें उसके निरंतर बहते आँसू भी शामिल थे जो अब सूखने को आए थे। वे आँसू उसी दूध के साथ बहते जा रहे थे। तेज बजती हर घंटी की आवाज़ उसे भीतर तक भयभीत कर रही थी। इतना डर उस लड़के को कभी नहीं लगा था—शायद उस रोज भी नहीं जब उसके पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और उन्हें लखनऊ के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पर आज वह डर के मकड़जाल में खुद को फँसता हुआ पा रहा था, जहाँ से बाहर निकल पाना एक लंबी लड़ाई को जन्म देने के समान था। वह लड़ाई जो उसे खुद से लड़नी थी। वह लड़ाई जो मुझे लड़नी थी... क्योंकि वह डर मेरा था। वह लड़का मैं था। जिसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी।
1 जनवरी, अंग्रेजी नए साल का पहला दिन। भारत एक ऐसा देश है जहाँ सभी धर्मों का सम्मान होता है। जहाँ ईसाई नए साल को पिकनिक और पार्टी के साथ मनाने वाला हिंदू, हिंदी नववर्ष भी पूजा-पाठ और माँ दुर्गा की आराधना करके मनाता है। कुछ कट्टरपंथी संगठन आज भी अपने तरीके से विरोध करते हैं, लेकिन साफ हृदय और निष्पक्ष व्यवहार वाला व्यक्ति इन सब नाटकों से स्वयं को दूर रखे हुए है। शायद यही हमारे देश का गौरव है जो एकता और अखंडता को बनाए रखता है।
पिताजी भी अपने कुछ मित्रों के साथ गाँव की खूबसूरती में चार चाँद लगाती सोन नदी को पार कर, कैमूर पहाड़ी के करीब कहीं पिकनिक मनाने गए हुए थे। घरवालों ने अपनी तरफ से कड़ाके की ठंड और दूरी का हवाला देकर मना भी किया था। लेकिन जिस गाँव की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर कोई भी व्यक्ति घंटों उसे निहार सकता है, कोई अनजान भी जिससे प्रेम कर सकता है, उस सौंदर्य से मेरे पिताजी खुद को दूर नहीं रख सके। और न ही घरवालों की ज़िद उन्हें रोक सकी। अक्सर हम वैसे काम करना चाहते हैं जिसमें हमारी अंतरात्मा प्रसन्न हो, और उस प्रसन्नता से हम कोई समझौता नहीं करना चाहते। पिताजी ने भी नहीं किया।
भगवान के प्रति अनन्य भक्ति ने उन्हें हमेशा जनमानस के कार्यों से जोड़े रखा। अक्सर नदी पार गुप्त धाम में कीर्तन का आयोजन उन्हें प्रकृति से जोड़े रखता था। अपने साथियों को 'ना' न कह पाने की आदत को वे आज तक अपना गुलाम नहीं बना सके थे। ग्राम प्रधान रहते हुए ग्रामीण स्तर पर बनाए उनके संपर्क आज भी उन्हें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाए हुए थे। इसी क्रम में उनका अपने साथियों के साथ पिकनिक पर जाना एक स्वाभाविक सा कदम था।
तेज ठंड और शीतलहर चादर फैलाए हुए थी। घने पेड़ की छाँव में नए वर्ष की पहली रात जश्न में बीत रही थी। उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध और हर अवसर पर भाने वाला व्यंजन—लिट्टी-चोखा, हरी धनिया की सुगंध लिए सबके पेट की अग्नि शांत कर रहा था। पीने के साफ पानी की उचित व्यवस्था न होने के कारण सभी ने नदी के पानी का उपयोग भोजन पकाने से लेकर पचाने तक में किया।
सुबह की शीतलहर में जब सूरज खुद को बादलों में छिपाए हुए था, मस्त-मलंग हवा खुले वातावरण में आजाद नाचती हुई ठंड को बढ़ा रही थी। धुंध सबकी आँखों की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रही थी, उसी दौरान सभी नदी के ठिठुरते पानी में नाव पकड़ने उतरे। वहाँ तक का सफर तय किया जहाँ तक पानी का बहाव कम था। चलती नाव पर हवा की तेज लहरें सभी की हड्डियों को चीरती हुई मानो आर-पार हो रही थीं। सभी अपने हाथ आपस में रगड़कर गर्म कर रहे थे, लेकिन शरीर को गर्म करने का कोई उपाय नहीं था। जब नाव दूसरे छोर पर लगी, तो पानी का सहारा लेना आवश्यक हो गया। घुटने तक पानी में वापस तय किए सफर ने सभी को ठंड की कँपकँपी का अहसास करा दिया था। इसके बाद सभी अपने-अपने घर के लिए निकल पड़े।
घर पहुँचने तक रास्ते में हल्की मीठी धूप सभी के शरीर को स्पर्श कर चुकी थी। ज्यादा नहीं, पर वह थोड़ी-सी गर्माहट उनकी हड्डियों तक पहुँची ठंड से निजात दिलाने के लिए काफी थी।
पिताजी के घर पहुँचते ही सब आश्चर्य से भर गए। किसी ने भी इतनी सुबह ठंड में उनके आने की उम्मीद नहीं की थी। सभी को दोपहर में धूप खिलने के साथ उनके आने की आशा थी। लेकिन किसी ने भी कुछ बोलना उचित नहीं समझा। पिताजी की जल्दी गुस्सा हो जाने की आदत भी शायद इसका कारण थी। सभी ने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया। दोपहर को भोजन करने के बाद उन्होंने अच्छी नींद ली। शायद थकान अपना काम ईमानदारी से कर रही थी, क्योंकि थकान के जाते ही नींद ने धोखा देना शुरू कर दिया। रात में जब थकान मिट चुकी थी, तब अनवरत कोशिशों के बाद भी नींद ने उन्हें अकेले ही रहने दिया। आँखों में नींद पूरी तरह जगह बनाए हुए थी, लेकिन देह अपने दर्द को फैलाती जा रही थी। इस कारण पिताजी ने पूरी रात करवटें बदलकर काट दी। माँ के पूछने पर कि "सब ठीक तो है?", पिताजी ने 'हाँ-हाँ' में सिर हिला दिया। पूरे शरीर की अकड़न और दर्द को वे पूरी रात इस उम्मीद में सहते रहे कि सुबह सब ठीक हो जाएगा।
सुबह ने शायद अपनी तैयारी रात में ही कर ली थी, या पिताजी की तैयारी अधूरी रह गई थी—यह समझना मुश्किल नहीं था। परिस्थिति रात से भी बदतर हो चुकी थी। पिताजी का शरीर दर्द से टूट रहा था, जोड़ों का दर्द असहनीय हो चला था। बिस्तर से नीचे उठते कदम उन्हें भीतर से कमजोर कर रहे थे। अचानक माँ की नजर उन पर पड़ी और बिना कुछ कहे माँ ने उनकी तकलीफ समझ ली। भारत में माँएँ बच्चों के प्रति ममता से भरी होती हैं, लेकिन पति के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा होती है जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती, केवल संकेत ही काफी होते हैं। यदि रिश्ता पावन हो, तो तर्क और संवाद की जगह संवेदना जीत जाती है।
माँ की नजर पड़ते ही पिताजी बोल पड़े, "शरीर में बहुत दर्द है, जोड़ों में अकड़न हो रही है।" माँ बिना कुछ कहे रसोई की ओर चल पड़ीं, इस उम्मीद के साथ कि यह ठंड का दर्द है। "जरूर ठंडी लग गई होगी... मैंने कहा था वहाँ न जाने को, लेकिन मेरी सुनता कौन है!"—इतना सब खुद से कहती हुई माँ अपनी ही चिंताओं में घिरती चली गईं। मैंने माँ को पिताजी से हमेशा कम बोलते देखा था, लेकिन वह उनकी चिंता बहुत करती थीं। माँ जब भी चिंतित होती थीं, उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बन जाते थे। एक घरेलू कामकाजी महिला, जो सिर्फ घर संभालती है, वह अपने परिवार के सुख-दुख में तन-मन से शामिल होती है। वह जानती है कि चिंता करने से समस्या का हल नहीं होगा, लेकिन गृहस्थ महिला के कष्ट में होने का प्रमाण और शृंगार दोनों ही 'चिंता' होती है। जिसे देखकर सामने वाला भले चिढ़ जाए, पर महिला तमाम कोशिशों के बाद भी उसे उतार नहीं पाती। उतारे भी कैसे? यह खुद से किया शृंगार नहीं, यह तो प्रेम को कष्ट के बादलों से ढकता देख खुद-ब-खुद घट जाता है—जैसे बादलों के बनने से बारिश होती है।
माँ ने पिताजी के पास जाकर गर्म कपड़े के टुकड़े से कुछ औषधीय पत्तों की मदद से सेकाई करना शुरू किया। पिताजी को हल्का आराम मिल रहा था। राहत से कम होती बेचैनी के बीच पिताजी ने माँ की चिंता को उनकी आँखों के नीचे के काले घेरों में देख लिया। पिताजी गुस्सा करना चाहते थे, लेकिन आराम ने उन्हें रात की अधूरी नींद के करीब खींच लिया।
दोपहर में माँ ने खाना बनाया और पिताजी को भोजन के लिए उठाने गईं। पिताजी ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा, माँ की आँखों के काले घेरे और गहरे हो चुके थे। माँ चिंता के समुद्र में गोते लगा रही थीं—लहरें कभी उन्हें खींचतीं, तो कभी तट पर फेंक देतीं। इस ऊहापोह के बीच माँ ने डॉक्टर को दिखाने की बात कही। हमेशा ज़िद करने वाले पिताजी ने माँ की चिंता को गहरा न करते हुए 'हाँ' में सिर हिला दिया। आँखों का वह काला घेरा उसी समय हल्का हो गया, आँखें सुबह धूप में खिलती कली के समान खिल गईं।
रात में कोई खास आराम नहीं मिला। सेकाई और गर्म पट्टी की मदद से ठंड की लंबी रात को और लंबा न होने देने की नाकाम कोशिश में माँ ने पूरी रात बिता दी। सुबह पिताजी और माँ दोनों रेणुकूट स्थित कंपनी के निजी अस्पताल में डॉक्टर के पास पहुँचे। डॉक्टर ने सभी उचित जाँच कराने की सलाह दी और रिपोर्ट के साथ वापस बुलाया। जाँच के बाद डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी और कहा, "सब कुछ ठीक है, बस ESR बढ़ा हुआ है जो पानी के इंफेक्शन से बढ़ जाता है।" उन्होंने MRI कराने की सलाह देकर घर जाने को कह दिया। "कोई खतरे की बात नहीं है"—इतना सुनकर सब खुशी-खुशी घर लौटे।
लेकिन दवाइयों के लगातार सेवन के बावजूद स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं दिख रहा था। मौसाजी और पिताजी ने बनारस जाने की तैयारी की। वहाँ एक बड़े अस्पताल में MRI जाँच पूरी हुई। शाम को मिली रिपोर्ट ने सारे शंकाओं को समाप्त कर दिया—नसों में किसी प्रकार की समस्या नहीं थी। लेकिन सवाल अब भी वही था कि तकलीफ आखिर क्यों है?
अब तक आसपास के गाँव और रिश्तेदारों में यह खबर हल्के धुएँ की तरह फैल रही थी। उस धुएँ से कुछ आँखों में आँसू बह निकले। बहते अश्रुओं के साथ लोगों का घर आना शुरू हुआ। इसी दौरान मैं भी घर गया हुआ था। मिलने वाले सिर्फ प्रेम, चिंता, आदर या फल लेकर ही नहीं आ रहे थे, साथ में सलाह की एक पोटली भी खोल रहे थे। वह सलाह उचित थी या अनुचित, इससे सभी अनजान थे—बताने वाला भी और सुनने वाला भी, जो बस शांत था। हर सलाह में कोई तीसरा व्यक्ति शामिल होता था जिसे बताने वाला दूर या करीब से जानता था। वास्तव में, हमें जानने-बताने से ज्यादा 'समझने' की आवश्यकता होनी चाहिए।
उन्हीं सलाहकारों में से एक ने आत्मविश्वास से भरकर कहा, "अरे बाबू, यह तो पक्का गठिया है... पक्का! इसमें गांठ-गांठ दुखता है, और कुछ नहीं है। हम राजगढ़ में एक वैद्य को जानते हैं, वो इसका सटीक इलाज करता है। तुरंत सब हल्का हो जाएगा। आप कल तैयार रहिएगा।"
जब इंसान मानसिक कष्ट में होता है, तो बुद्धि धोखा देती है; लेकिन शारीरिक कष्ट बुद्धि और विवेक दोनों को हर लेता है। कष्ट से बाहर निकलने की उम्मीद में हर सलाह संजीवनी बूटी लगती है—अनपढ़ और ज्ञानी दोनों की बातें समान प्रतीत होने लगती हैं। मैं घर पर था और साथ में राजगढ़ भी जा रहा था। मैं उम्र में इतना छोटा था कि किसी सलाह को समझने की क्षमता मुझमें नहीं थी। मेरे पास पिताजी के लिए कोई सलाह नहीं थी, मैं बस सेवा के भाव से खुद को समर्पित कर रहा था। भैया उस वक्त ओबरा में बाहर थे, इसलिए वे न जा सके। पिताजी के साथ दादाजी भी गए थे, जिन्हें पुरानी गठिया की शिकायत थी, और सलाह देने वाले मामा श्री—जिन्हें पूरा गाँव 'जगत मामा' कहता था, पर वे पिताजी के सगे मामा थे।
वहाँ पहुँचते ही हमारी मुलाकात छोटे कद, लटकती तोंद, बड़े बाल और दाढ़ी वाले एक बाबा से हुई, जो शर्तिया इलाज की गारंटी लिए बैठा था। देखते ही उसने लालची मुस्कान के साथ सबका स्वागत किया और अपना औजार निकाला—एक टेढ़ी सुई, जिसे वह हर जोड़ पर चुभाने वाला था।
"का बाबू, एक दिन में कै बेरी साँस लेवअ?"—मुझसे उसने एक बेतुका सवाल किया और पान चबाते हुए काले-गंदे दाँतों को निकालकर खुद ही जवाब दिया। फिर उसने सुई जोड़ों पर चुभो दी। गाढ़ा खून बाहर निकलने लगा और वह जोर-जोर से पैरों को दबाने लगा, यह कहते हुए कि सारा गंदा रक्त बाहर निकल रहा है। "बतावा, कईसन लागत ह?"
पिताजी ने 'हाँ' में सिर हिलाया। उस वक्त उनका सिर हिलाना अच्छा था या बुरा, मैं नहीं समझ सका। उस ढोंगी ने हँसते हुए कहा, "कुल ठीक हो जाई।" और एक पुड़िया में पिसा हुआ चूर्ण पकड़ाकर 1000 रुपये की पर्ची काट दी।
भारी मात्रा में खून बहवाने के बाद, हाथ में एक पुड़िया लिए हम देर रात घर पहुँचे। माँ रसोई से, हाथों में आटा रँगे दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई। मैंने माँ को बचपन से ज्यादातर समय रसोईघर में ही देखा था। मैंने उन्हें कभी थककर आराम करते नहीं देखा, बस खटते देखा था। हमारे सोने के बाद सोतीं और उठने से पहले उठ जाती थीं। दरवाजे पर खड़ी माँ ने मुझे उम्मीद भरी नजरों से देखा, लेकिन मैं उनकी ओर विश्वास भरी नजरों से नहीं देख पाया। मैं सच में इस नाटकीय इलाज से संतुष्ट नहीं था।
पिताजी ने हल्का भोजन किया और थकान का हवाला देकर सोना उचित समझा। उनकी इस थकान को मैंने उनका अस्वस्थ महसूस करना समझा—जो कि सच था। उस ढोंगी के सामने हिलाया गया सिर आराम का नहीं, बल्कि अफसोस का प्रतीक था। पिताजी को वहाँ जाकर गलती करने का अहसास वहीं हो चुका था।
अगली सुबह का सूरज अपने साथ पीड़ाओं का संदेश लेकर आया। पिताजी उस पीड़ा को भोग रहे थे, माँ उस पीड़ा में जी रही थीं, और हम सब उसकी आँच झेल रहे थे।
दवा और ढोंगी—दोनों के बेअसर होने के बाद सबने दूसरी राह देखना शुरू किया। गाँव में आज भी विज्ञान हर उस जगह हार जाता है जहाँ कोई दवा बेअसर हो जाती है, और उस बेअसर दवा के आगे अंधविश्वास जीत जाता है। हनुमान चालीसा से भूत-पिशाच न मिटा पाने वाले लोग तंत्र-मंत्र से अभिमंत्रित करके कष्ट निवारण की बात करने लगते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। किसी ने सोने से पहले शिव जप की सलाह दी, किसी ने कमरे के कोने में अगरबत्ती जलाने को कहा, तो किसी ने सिरहाने लोहे की वस्तु रखने को।
इसी दौरान पिताजी फोन पर मौसाजी से बात कर रहे थे। मौसाजी दूसरे छोर से लखनऊ के बड़े अस्पताल में दिखाने की सलाह दे रहे थे। पास बैठी फुआ—जो पिताजी को देखने आई थीं—यह सब सुन रही थीं। मैं पास ही खड़ा अपने पैर के अंगूठे को जमीन पर रगड़ रहा था। अचानक मैंने देखा कि फुआ की साँसें तेज होने लगीं, उनकी आँखों में असाधारण-सा बड़ापन आ गया, शरीर में तेज अकड़न और भारी आवाज निकलने लगी। यह सब देखकर मैं डर गया। भीतर से माँ, आजी और बैठका से बाबा दौड़े आए। तब तक फुआ द्वारा पिताजी की कमर पर लात से दो-तीन प्रहार किए जा चुके थे—"कहीं चल जा, ठीक ना होबे... हमरे लग्गे आवे के पड़ी!"
मैं यह सब देखकर रो रहा था। मेरे सामने एक अजीब और भयानक घटना घट रही थी, जिससे मेरा सामना कभी नहीं हुआ था। मैं रोते हुए पिताजी के पास गया और डरकर उन्हें जोर से पकड़ लिया। वे मुझे सहलाते रहे। अचानक देखा कि माँ घुटने पर बैठकर फुआ से माफी माँग रही हैं—"क्षमा देवी... क्षमा, माफ कर दें।" कुछ ऐसा ही मैंने आजी को भी करते देखा। मैं स्तब्ध था, शायद मैं इसके लिए तैयार नहीं था... आज भी नहीं हूँ। माँ ने बाद में बताया कि मुठेर की देवी माँ आई थीं। सबने मिलकर राय बनाई कि देवी माँ ने बुलाया है, वहाँ जाना चाहिए।
पिताजी चुप थे। अब वे वही कर रहे थे जो सामने वाले तय करते। वे इस अप्रत्याशित तकलीफ से थक चुके थे। माँ, पिताजी, भैया और मैं साथ घर से निकले। मैं वापस शक्तिनगर चला गया और पिताजी मुठेर के लिए निकले। विदाई के वक्त पिताजी की नजरों में मैंने अपने लिए अथाह प्रेम देखा—इतना कि मैं उसमें जीवन भर तैर सकता हूँ, हर डुबकी में उनसे मुलाकात कर सकता हूँ। वह मेरी पिताजी से अंतिम मुलाकात थी, उसके बाद मुझे यह सौभाग्य कभी नहीं मिला।
मंदिर पहुँचते ही जानकारी मिली कि मंदिर की प्रतिनिधि वहाँ नहीं है—जो खुद को भगवान (देवी का रूप) बताती थी। मूर्तिवत देवी अब भी वहाँ विराजमान थीं, लेकिन वे यह दावा नहीं कर रही थीं कि "तुझे मैंने बुलाया है।" वे सभी भक्तों की तरह पिताजी को भी अपना आशीर्वाद दे रही थीं। आधुनिक युग की उस 'देवी' से जब फोन पर संपर्क किया गया, तो उसने बाहर होने की बात कही, पर पिताजी को शहर से बाहर न जाने की सलाह दी। "सिवान से बाहर जाना उचित नहीं"—इस दलील ने पिताजी को इस उम्मीद में बाँधे रखा कि देवी ने बुलाया है, देवी ने बोला है। उम्मीद को दीमक लगता गया, दिन बीतते गए। आधुनिक देवी ठंड की धुंध में धुँधलाती गई और उधर पिताजी की तबीयत बिगड़ती चली गई।
थक-हारकर उन्हें पास के ही अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बार इलाज में पीलिया के संकेत थे। दवा चल रही थी—अब सिर्फ दवा का सहारा था, देवी का नहीं। डॉक्टर का कहना था कि देवी द्वारा की गई देरी से बहुत देर हो चुकी थी, पीलिया आंतों तक पहुँच गया था। इलाज के दौरान एक दिन डॉक्टर की बड़ी लापरवाही ने बँधती उम्मीदों पर खंजर चला दिया—पिताजी को एक्सपायरी (पुरानी डेट का) इंजेक्शन दे दिया गया। हम वापस वहाँ से भागे। बनारस के डॉक्टरों से होते हुए भैया उन्हें लेकर लखनऊ भागे। छोटे बाबा, जो हमेशा सहारा थे, उनकी मदद से अस्पतालों की भीड़भाड़ से इतर हमें जल्दी प्रवेश मिल गया। इलाज जारी था।
कुछ दिनों के आंशिक सुधार के बाद वापस दुनिया बदलने लगी। पिताजी का रंग-रूप बदलने लगा, शरीर से पपड़ियाँ छूटने लगीं। कुछ ही दिनों में देह से सारे कपड़े उतार फेंके गए। मेरे पिताजी हमेशा कपड़ों के शौकीन रहे थे—तरह-तरह के कुर्ते और सदरी (जो ज्यादातर छोटे बाबा की पसंद की होती थीं), लेकिन अंत समय में वह सब छिनता गया। पास होते हुए भी छिनता गया... जिंदा रहते छिनता गया।
लेकिन किसी ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। छोटे बाबा इस स्थिति को देखकर भी सजल आँखों से उन्हें दिल्ली के अस्पताल ले जाने की बात कर रहे थे। किसी ने मुझसे पिताजी की कुंडली पंडित जी को दिखाने को कहा। मैं भागा-भागा घर गया, वहाँ से कुंडली लेकर शक्तिनगर में घर के सामने वाले पंडित जी के पास आया। उन्होंने कहा, "ग्रह है, टल गया तो लंबी आयु होगी... अभिषेक करना होगा।" मैं वह सब करने को तैयार था जो पिताजी के लिए आवश्यक था। वास्तव में हम स्वार्थी होते हैं, हम अपने फायदे के लिए सब कुछ ढूँढते हैं। मैं भी अपने पिताजी की बिखरती, गुम होती साँसें ढूँढ रहा था—जो न तो मुक्त हवा में थीं और न उस अस्पताल में, जहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। मैं उन्हें मंदिर में, इस अभिषेक में, भक्ति में ढूँढ रहा था।
मैंने अभिषेक प्रारंभ किया, लेकिन मेरे डर ने मुझे कभी भक्तिमय नहीं होने दिया। मेरा डर जीतता गया और पिताजी की अस्वस्थता बढ़ती गई। (कुछ दिन पहले भी एक पंडित ने ग्रह का प्रभाव बताया था, जिसके बाद से माँ हर बृहस्पतिवार को व्रत रखती थी। वास्तव में यह सब सच से भागने का एक मनगढ़ंत रास्ता था, जिस पर लंबा भटकाव था, स्थिरता नहीं थी, जीवन नहीं था।)
मैंने पिताजी से फोन पर बात की—नहीं, मैं फोन पर रोया। वहाँ आने की ज़िद की। वे नहीं माने। वे ज्यादा नहीं बोले, बस इतना कहा, "हम ठीक हैं बेटा, चिंता मत कर।" मैं रोता रहा। अंत में पिताजी ने कहा, "बेटा हमारा आज्ञाकारी है, पिता-भक्त है।" मैं फोन रखकर रोता रहा। उनकी आवाज थक चुकी थी, वे खुद थक चुके थे। वे सच को अपनाने के लिए अब भी तैयार नहीं थे।
यहाँ मेरा दम घुट रहा था। भैया और रोशन भैया दिन-रात निष्ठा और लगन से उनकी सेवा में तत्पर थे। रिश्तेदारों का आना-जाना प्रारंभ था। उसी शाम मैंने रोशन भैया को फोन किया। उन्होंने खुद को संभालते हुए 'सब ठीक है' कहकर मुझे बहलाने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वे फूट पड़े—"अब बस अंतिम समय है, तुम यहाँ मत आओ।"
बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक हमारे घर जाने की तैयारी करा दी गई। मैं और मीनू (मेरी फुआ की लड़की) दादाजी के कमरे पर ठहरे, जहाँ से हमें घर जाना था। सुबह गाड़ी लेकर एक सज्जन आए, जो रिश्ते में चाचा लगते थे। उन्होंने दया की दृष्टि से मुझे देखा, मेरी आँखों में आँसू थे। वे बोले, "चिंता मत कर, वो लोग दिल्ली जा रहे हैं।" लेकिन वे मुझसे नजरें नहीं मिला पा रहे थे। मैं रास्ते भर हर उस व्यक्ति को फोन करता रहा जो पिताजी के पास था, लेकिन किसी का फोन नहीं लग रहा था।
घर पहुँचा तो दरवाजे पर भारी भीड़ थी। इतना देखते ही मैंने अनहोनी का अंदाजा लगा लिया। एक पिता (बाबा) चबूतरे पर बैठकर बिलख-बिलखकर रो रहे थे। उनके सामने की जमीन को गोबर से लीपा जा रहा था। कुछ लोग बाँस काट रहे थे, जिसकी आवाज साफ आ रही थी। लोग उन्हें संभाल रहे थे। वे अपने आप को दुनिया का सबसे अभागा व्यक्ति मानकर भगवान को कोस रहे थे, अपने पापों की सजा में खुद के लिए तत्काल मौत माँग रहे थे।
अंदर आँगन में माँ बेहोश पड़ी थीं। उन्हें जबरन होश में लाया जा रहा था। होश में आते ही "कहाँ गइल हो हमार लाल!" कहकर वे वापस मूर्छित हो जाती थीं। वहाँ वे तमाम लोग थे जो पिताजी से जुड़े थे, सबकी आँखें नम थीं। एक मैं था, जो इन सब के बीच माँ को ढूँढ रहा था। घर का पूरा चक्कर लगाकर भी मैं माँ को नहीं देख पा रहा था। अचानक मुझे पिताजी के साफ-सुथरे कपड़े नजर आए। मैं उनसे लिपटकर रोने लगा। उनमें पिताजी की वही पुरानी खुशबू आ रही थी, जो कुछ समय तक उनके देह से चिपकी रहती थी। मैं फूट-फूटकर रो रहा था, उन यादों में तैर रहा था जिन्हें मैंने अब तक सहेजा था। भले ही उनके साथ कम समय मिला, लेकिन यादों का घोंसला बहुत मजबूत बन चुका था—जिसमें मैं आज भी उनकी खुशबू महसूस करता हूँ और चैन से सोता हूँ।
अचानक कोई भीतर से आया और मुझे चुप कराता हुआ माँ के पास ले गया। माँ अंदर अँधेरे कोने में लेटी हुई थीं—बिल्कुल कमजोर। पिताजी की सेवा में उन्होंने अपना सब कुछ त्याग दिया था, बस चंद साँसें और कृषकाय देह थी जो उन्होंने हमारे लिए बचा रखी थीं। माँ बिल्कुल शांत थीं, उनकी आँखों में आँसू नहीं, एक गहरा शून्य था—जो यह दर्शा रहा था कि अब उनके पास शून्य के सिवा कुछ नहीं बचा। उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था। माँ मुझे चुप कराती रहीं। मैं माँ को न रोने की कसम देता रहा। माँ मेरे सामने बिल्कुल नहीं रोईं।
मैं बाहर बाबा के पास आ गया। मैं नहीं रोया... फिर मैं कभी नहीं रोया। बाबा मुझे उम्मीद भरी नजरों से देखते रहे। उनकी आँखों में बड़े-बड़े आँसूंओं के बीच पिताजी का चित्र तैर रहा था, जो हर बूंद के साथ धरती में मिल रहा था। सभी पिताजी के पार्थिव शरीर के आने का इंतजार कर रहे थे। गाँव के हर वर्ग, हर जाति और हर समुदाय के लोग घर पहुँच रहे थे। पूरी छत भीड़ से भर चुकी थी। हर ओर से क्रंदन की आवाज आ रही थी जो मन को विचलित कर रही थी।
मैं बैठका के एक कोने में जाकर बैठ गया। पिताजी का देह आया। अचानक रोने की आवाज और तेज हो गई। भीतर से माँ गिरते-पड़ते बिलखती हुई बाहर आईं—तमाम शिकायतों की पोटली लिए। वह पिताजी से अपने कष्टों की शिकायत कर रही थीं। हर चीख से मानो धरती का कलेजा फट रहा हो। माँ को इस हालत में देखकर मुझे लगा कि या तो भगवान नहीं है, और यदि है तो अपने कृत्य पर शर्मिंदा है। माँ ने झूठ बोला था—वह खूब रोईं। उनके आँसू सूखे नहीं थे, पुत्र का बाँध उन्हें रोके हुए था जो पति को देखते ही टूट गया। वहाँ मौजूद सभी लोग रोए। सबकी आँखों में बेहिसाब आँसू थे—इतने कि अगर एकत्र किए जाते तो भावनाओं की बाढ़ आ जाती। रोने की तेज आवाजें पहाड़ों से टकराकर और तकलीफ दे रही थीं।
मैंने पिताजी के चरणों को स्पर्श किया, जिन्हें एक बैग में बंद करके लाया गया था। मैं पिताजी का चेहरा नहीं देख सका। लोग कहते हैं कि वह बिल्कुल बदल गया था, किसी अनजान चेहरे जैसा हो गया था। मुझे तो पिताजी का वही पुराना चेहरा याद है।
मुझे तुरंत वहाँ से हटाया गया। फूफाजी मेरे पास आए और बिलखते हुए बोले, "माफ कर दो बाबू, हम तुमसे झूठ बोले।" मेरे सामने भैया निढाल होकर रो रहे थे। एक पुत्र, जिसने पिताजी के अंतिम समय को जिया था, वह उनके जाने पर अकेला महसूस कर रहा था। एक ऐसा पुत्र, जिसके कंधों पर सारी जिम्मेदारी थोप दी गई थी—मात्र इसलिए क्योंकि वह बड़ा था।
भैया को अंत्येष्टि के लिए तैयार किया गया। पिताजी ने नए जीवन में प्रवेश किया।

लोग कहते हैं कि उस दिन मेरे पिताजी की बीमारी से मृत्यु हुई थी। लेकिन मेरा मन और मेरी आत्मा आज भी चीख-चीखकर कहती है कि वह मृत्यु नहीं थी—वह एक सुनियोजित हत्या थी।

एक ऐसी हत्या, जिसकी कहानी धर्म के आवरण में लिखे गए ढोंग ने रची थी। जहाँ देवी का छलावा बनकर बैठी एक पाखंडी औरत ने समय को दीमक की तरह चाटा, जहाँ राजगढ़ के उस ढोंगी बाबा की सूई से बहते खून ने शरीर की बची-खुची ताकत निचोड़ ली, और जहाँ चिकित्सा की लापरवाही रूपी खंजर ने उम्मीदों का गला घोंट दिया। 

धर्म और आस्था के नाम पर फैले इस आडंबर ने भगवान को तो कहीं नहीं दिखाया, पर मेरी आँखों के सामने मेरे पिता को धीरे-धीरे घोंट-घोंटकर मार डाला। उस दिन सिर्फ मेरे पिता की साँसें बंद नहीं हुई थीं... उस दिन धर्म के ढोंग, देवी के पाखंड और समाज के अंधे विश्वास ने मिलकर मेरे पिता की हत्या की थी।
कुछ वर्षों के पश्चात अखबार में खबर छपी की स्वघोषित देवी मां को  हत्या के आरोप में जेल हुई है। 

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पिताजी की हत्या

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