सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Tuesday, July 28, 2026

बरगद की छांव और गिलहरी के आंसू- (ईश्वर होने के कुछ क्षण)

मैं केन्द्र को छूकर परिधी से बाहर भाग जाता हूं 

             ( उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माननीय राम                                 नाईक जी के साथ वर्ष- 2016)



वो सफेद हाफ टी-शर्ट में हास्पिटल के बेड पर पीठ के बल लेटे हुए थे। आंखों का चश्मा थकान के कारण थोड़ा निचे सरक आया था। गालों पर सफेद दाढ़ी उनकी अलसाई हुई झुर्रियों से बाहर झांक रहीं थीं। जो मेरे स्मृतियों में कहीं अंकित नहीं था। मैंने बाबा को सदैव सुसज्जित और सुदर्शन अवस्था में पाया है। बाबा की देंह बहुत तेजी से बड़ी हो रही है। रेखाएं कहीं नहीं जाना चाहतीं, वो ठीक-ठीक वहीं छुपती जा रहीं हैं जहां वो उम्र के सराय पर विश्राम के लिए ठहरी थीं। झुर्रियां कभी उगती हैं कभी छुप जाती हैं। 

                       (बाबा के साथ वर्ष- 2022)

मैं उनके पास पहुंचा और चेहरे के पास थोड़ा झुककर कहा.. बाबा आज आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं। 
कल से आप बहुत बेहतर हैं। और सोडियम भी अच्छी जगह पहुंच रहा है। (बाबा को आई.सी.यू. में सोडियम की कमी के कारण भर्ती किया गया है।)


थोड़ा मुस्कुराते हुए, (जो उनके स्वस्थ चेहरे पर हमेशा विद्यमान रहती है) उन्होंने कहा, तोहरो चेहरा आज ठीक लगत बा। कल लग रहा था कि जैसे थकान बहुत ज्यादा हो गई है तुम्हें। 

मैं अभी विश्राम करके आ रहा हूं। अच्छी नींद ली है मैंने। 
बाबा ने थोड़ा और मजबूत मुस्कान अपने चेहरे पर लाने का प्रयास किया और मैं उनके बाल सहलाने लगा। (वर्तमान में वो हर छोटे परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।) 
उन्होंने मुझे अपनी गोल बड़ी और सजल नेत्रों से देखते हुए पूछा, कंघी कहां बा हमार? उनकी आंखों में मैं तैर रहा था। मैं उस पवित्रता में तैरता हुआ उनसे झूठ नहीं बोलना चाहता था। थोड़ा अलग हटकर , ठीक उस दूरी से जहां से वो मेरी धीमी आवाज को सुन सकें, मैंने कहा बाबा आपके बाल ऐसे हीं सजे हुए लगते हैं। अभी ये व्यवस्थित हैं। 
यह झूठ था। बाबा के बाल के संबंध में नहीं। कंघी के संबंध में। 
जबसे उन्होंने अपने स्वास्थ्य में हल्का सुधार पाया है वो अपने नैसर्गिकता के बहुत समीप पहुंचना चाहते हैं। 
उम्र और अस्वस्थता के जालों को तोड़ते हुए वो उस जीवन को छूना चाहते हैं जो वह जीते आए थे। लेकिन हर छोटी इच्छा को उनका क्षीण होता स्वास्थ्य निगल लेता। जाले तक पहुंचते हाथों को कभी तेज खांसी, कफ का कोई मलवा या सांसों से उनकी लड़ाई पीछे खींच लेती। इन सभी को हरा वो वहां पहुंच भी जाते तो दस्त उन्हें बहुत पिछे ढकेल देता। भोजन की मात्रा बहुत कम हो गई है। पीड़ा उनके होंठों पर नृत्य कर रही है। कंपकंपाती हथेलियां अपने सारे दैनिक कार्य स्वयं से करने का साहस बटोर रही हैं।
फिर भी उनकी सहनशीलता और धैर्य के समक्ष ये सब बौने नजर आ रहे थे। लेकिन हम उनके द्वारा निर्देशित चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में रखते। और उनकी इच्छाओं को आई.सी.यू और हास्पिटल के पैमाने पर परखते हुए प्रेषित करते। 
कभी-कभी इसका झुंझलाहट उनके चेहरे पर साफ नजर आता। उनके व्यवहार में हल्का रूखापन झलकने लगता।
"क्या लगता है आपको,आप लोग बहुत अनुभवी हो गए हैं? कुछ बोली ला तो सुने के चाही न। 
आप लेकर के चिजों को आइए। जो मेरे आवश्यकता की होंगी उन्हें मैं उपयोग करूंगा। या वो रखी रहेंगी।" 
उनकी आवाज उतनी स्पष्ट नहीं थी जितनी वो सदैव हुआ करती हैं। थकान मिश्रित आवाज बहुत धीमी मगर तीखी थी। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर आए असहजता को भांपते में देर नहीं लगाई। 
ऐसा मत सोचिहे कि बाबा डाटत बड़न। बाबा बीमार हैं। हम तोहरा बहुत मानी ला। हमेशा से तु सबसे अलग दिखले, तुम्हारा स्वभाव सभी से अलग है।  फूआ के साथे रहीहे। 
फिर अचानक से बच्चों जैसी निष्छल मुस्कान उनके गालों पर प्रकट हुई जिसने उनकी सारी झुर्रियों को धुल दिया था। देख बाबा हंस देलन चल्ल... 
मैंने पहले कभी उन्हें इतना साधारण और निहत्था नहीं पाया था। मानों जैसे उन्होंने अपने सारे इच्छाओं का एक पल में समर्पण कर दिया हो। 
मैंने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया, अरे! नहीं बाबा ऐसा कुछ नईखे। आप आराम करिए। जो थोड़ा कुछ भी शरीर समेट रहा है आप बोलकर या गुस्सा करके सब खर्च कर दे रहे हैं। आप सोइए।
                               (बाबा वर्ष- 2016)


ऐसे हीं हंसत रहल कईली। 
पिताजी के याद हऊ? 

​मैं शायद इस अचानक आए प्रश्न के लिए तैयार नहीं था। भीतर कुछ टूटा, पर स्वयं को रोकते हुए भी मेरी जीभ से कुचले हुए वाक्यों के कुछ शब्द बाहर आ ही गए— "हां बाबा..." और फिर मैं मौन हो गया।


पिताजी का पूरा होना

​पिताजी का जिक्र होते ही मानो मैं भीतर तक पवित्र हो जाता हूं, और वही पवित्र जल आंखों के कोरों में इकट्ठा होने लगता है। मैंने किसी तरह स्वयं को संभाला।

हम उनका नाई बचा पईली। 
बहुत प्रयास किया मैं। बहुत हीं संतोषी और ईमानदार व्यक्ति था। ऐसा नहीं है कि मेरे सभी फैसले सही थे लेकिन मेरे बहुत से फैसलों पर कभी उसने शिकायत नहीं किया। वो भी हंसत रहत रहन। 
तु आराम कर् बाबा, वो कराहते हुए पिछे सरक रहे थे। मैं उन्हें सहारा दे रहा था। 
क्या बाबा के सामर्थ्य में था पिताजी को बचा पाना? 
नहीं, प्रारब्ध और नियती तमाम तकनीकी और चिकित्सीय शक्तियों से बड़ी होता हैं। लेकिन यह भी सच है कि हमने अपने जीवन के किसी भी संकट की घड़ी में सबसे पहले बाबा की ओर ही देखा है। मनुष्य कुछ ही पलों या क्षणों के लिए ही सही, किसी न किसी का 'ईश्वर' हुआ करता है। मनुष्य के भीतर के श्रेष्ठतम का प्रकाश पुंज ही तो उसे भगवान बनाता है—वह प्रकाश, जो सामने वाले के अंधकारमय जीवन में रोशनी बिखेर दे। यह दैवीय प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है, और मैंने समय-समय पर बाबा के भीतर इस प्रकाश को सबसे प्रखर रूप में देखा है। उसी प्रकाश से आलोकित होते हुए मैंने अपनों को और स्वयं को बढ़ते देखा है।
उनके संपन्न, सुसज्जित और गौरवान्वित वर्तमान से सभी थोड़ा टुकड़ा रखना चाहते थे। शायद यह हमारा आलस्य हो सकता है। जहां हम सदैव उनके प्रति इच्छित हीं रहे। कभी यह नहीं सोचा की उनकी हमसे क्या उम्मीद हो सकती है। अपनी नाकामयाबी से लेकर विपन्न वर्तमान के लिए हमारे प्रश्न उन्हें भेदते रहे। कहीं यहीं उनके मानसिक दुख का कारण तो नहीं?
मैं सदैव अपने लुलुपता भरे जीवन से उन्हें दूर रखने का प्रयास किया। अपनी इच्छाओं को उनके सहारे से पृथक रखने का प्रयास। 
हम जिससे प्रेम करते हैं उसके प्रति सम्मान स्वयं अपना स्थान बना लेता है। बाबा मेरे जीवन में उसी बरगद के भांति हैं जिसकी जड़ों से धवल श्रद्धा फूटती है। सुविचारों का जन्म होता है। जहां प्रेम के बदले प्रेम की इच्छा जन्म नहीं लेती। बदले की भावना नहीं भटकती। कुछ मिलने की उम्मीद में थोड़ा और देने का क्रम आगे बढ़ाया जा सकता है। 
शायद इसीलिए, इस विशाल बरगद के सामने मैंने अपने जीवन में एक 'गिलहरी' होना चुना है—जो अपने छोटे-छोटे प्रयासों से इस सेतु को बांधे रखना चाहती है।
बाबा अक्सर पूछा करते थे चार धाम कौन-कौन से हैं? चार वर्ण, चार आश्रम? 
मुझे वो सारे उत्तर आज भी याद हैं। 
वो प्रश्न क्यों पूछे गए थे इसका मर्म अब समझ आता है। वो सेवा और त्याग और समर्पण के बीज थे। 
रोशन के अंदर भी बहुत सेवा भाव है। 
हां बाबा, लेकिन वो भी अपने स्वास्थ्य से चिंतित हैं। 
उन्हें ठीक से नींद नहीं आ रही थी। कभी थकान, कभी घबराहट तो कभी कोई स्मृति उनके नींद में दखल दे रही थी। नींद जो हमारे कष्टों को भी थोड़ा आराम देती है लेकिन उनकी पीड़ा की लौ हमेशा उनके शरीर पर फड़फड़ा रही थी। 
क्या हुआ बाबा? 
बहुत आवाज आ रही है मशीनों की। 
उन्होंने बीते कुछ दिनों से अच्छी नींद ली थी। 
बीते सोमवार जब वो व्यायाम करने के लिए के.जी.एम.यू में आए थे तो अचानक से उनकी तबीयत बिगड़ गई। जिस कारण उन्हें तत्काल भर्ती करना पड़ा। 
रात के १० बजे के आसपास जब मैं उनसे मिलने भीतर गया तो दादा वहीं उनके समीप खड़े थे। नाक में आक्सीजन सपोर्ट के लिए नाजल कैनुला और बीपी मापने का कफ लगा हुआ था। ऊपर ऑसिलोस्कोप मॉनिटर में हरी रेखाएं तैर रहीं थीं। 
छोटू आया है, कानपुर से। 
बाबा पूरी तरह अचेत नहीं थे। मुझे देखते हीं शब्द उनके कांपते होंठों पर फड़फड़ाने लगे लेकिन बाहर कूदते उससे पहले वो मृत होकर होंठों के किनारे पर एकत्रित हुए जा रहे थे। 
मैं कुछ बोल नहीं पाया और बाहर आ गया। 

मैं अभी भी फूआ के साथ बाहर बरामदे में बैठा हूं। उसके छटपटाते हुए सवालों पर संतोष और संवेदना के थके हुए टुकड़े फेंके रहा था।  लंबी यात्रा करके मेरे जबाब भी कमजोर हो चुके हैं। वहीं बातें मैं बार-बार दुहराने लगा हूं। जैसे बाबा अपनी रोज की मौलिक चाहना बार-बार दुहरा रहे हैं। मैं हर बार फूआ के दुख को खरोंचे बिना वहां से निकलता आया हूं लेकिन आज यह असंभव लग रहा था। भीतर एक डर बैठा था.. मानों जो मैंने यहां से कदम बढ़ाया तो पहला कदम दुख को कुचलता हुआ निकलेगा। जहां सिर्फ भविष्य की चिंता होगा और बहुत से प्रश्न। 


अब हम निकलब फूआ। 

बाबा से मिल ले? 

पता नहीं,
मैं अपनी आत्मिक दरिद्रता और यह लाचारी बाबा को नहीं दिखाना चाहता था। लेकिन समाज में जीते हुए जिस सामाजिक प्रतिष्ठा को उन्होंने कमाया है, उसने उन्हें वह दिव्य दृष्टि प्रदान की है जिससे वे बिना कहे हर किसी की परिस्थिति और मजबूरी को भांप लेते हैं। वे हमेशा बातचीत में उतना खाली स्थान छोड़ देते हैं, जहां से सामने वाला आत्मसम्मान के साथ चुपके से निकल सके।

उन्होंने चश्मे को ठीक करने का प्रयास करते हुए कहा, "ठीक बा जा, हमार इ चश्मा थोड़ा ढीला हो गईल बा। चौराहे पर ABC चश्मा वाला है, वहां पर ये थोड़ा ठीक करावे के लिए किसी से बोल दीह।"
और रात में भोजन के साथ एक छोटा सा टुकड़ा लाल पेड़ा के भेज दीह। वो आर्या जी लेकर आए हैं। बहुत स्वादिष्ट होता है। बनारस का लाल पेड़ा। 

जी, लेकिन वो थोड़ा कठोर है बाबा। 

वो, आप उसकी छोटी-छोटी लड्डू जैसा बना देंगे तो वह अच्छा हो जाएगा खाने लायक, हल्का मुलायम।


जी बाबा, और मैं अपनी स्वार्थी आत्म-तृप्ति की भटकन में वहां से निकल पड़ा। ग्लानि, पश्चाताप और बेसब्री के आंसुओं से भीगा हुआ मैं... जो उस वक्त खुद को पूरी दुनिया से छुपा लेना चाहता था।



"कुछ दुखों पर हमें विश्वास हीं नहीं होता कि यह हमारे हिस्से का दुख है। वह हमारी कल्पना में दूर-दूर तक नहीं था। हमारी तैयारी भी नहीं होती। 
उस दुख के साथ हम जीना नहीं चाहते पर फिर भी उसका एक  टुकड़ा हमें जिंदा रखता है। हृदय में थोड़ा संतोष उत्पन्न करता है। इस प्रकार का दुख बहुत हीं स्वार्थी और निर्मल होता है। बाबा को इस कष्ट के साथ देखना उसी दुख में संतोष और संभावना ढूंढने जैसा है। मैं जानता हूं अपने तमाम प्रयासों के बाद भी
भविष्य में अपने इन स्मृतियों को अतीत से बाहर नहीं नोच पाऊंगा। वो कहीं एकत्रित हुआ बैठा रहेगा।"

​"और दुख... यूँ ही सदैव भूत, भविष्य और वर्तमान के हर क्षण में स्वयं को तटस्थता से उपस्थित रखेगा। वह हमारी उदासी और अतृप्ति को देख, अपने इस अनंत विस्तार को सम्मान देगा।

​वह दुख, जो सबसे बड़ा है।

हिमालय की सबसे ऊँची चोटी से भी विशाल,

किसी कठोरतम पर्वत से भी दृढ़,

और बंजर रेगिस्तान से भी अधिक तपता हुआ।

गहरे समुद्र से भी अधिक खारा।

​वह गंगा की शुद्धता से भी पवित्र है,

मुझसे भी बड़ा है और तुमसे भी बड़ा।

वह मंदिर की भव्यता से भी ऊँचा है,

और उसमें बैठे उस भगवान से भी...

यहाँ तक कि उस बरगद से भी विशाल है, जिसकी तुलना मैं 'बाबा' से करता हूँ।

​वह बड़ा है... सचमुच, दुख सबसे बड़ा है,

मृत्यु के अंधकार से भी अधिक गहरा।"


​"दुख... न जाने देह के किस हिस्से से जागता है?

जीवन के किस कोने में चुपचाप पड़ा रहता है?

मैं कभी समझ ही नहीं पाया कि बाबा का दुख आख़िर आता कहाँ से है?

और अगर आता भी है, तो उनकी देह पर टिकता कहाँ है?

अपनी मामूली ज़रूरतों से उन्होंने दुख के हर तिनके को, उसके सूक्ष्मतम कण को भी अपने शरीर से पोंछ डाला था।

हम उनके दुख की किसी कमजोर टुकड़े तक पहुँच भी पाते, उससे पहले ही वे उसे झाड़कर हमारे सामने आ बैठते—पूर्ण सुख में न सही, पर जीवन के एक गहरे संतोष के वर्तमान में।"

जहाँ हमारी छिछली ज़रूरतों में उलझा जीवन अचानक उद्देश्यहीन नज़र आने लगता।



पुनश्च
दिनांक - ३०-०७-२०२६

मैं अस्पताल में था। बाहर बरामदे में बैठा इंतजार कर रहा था। इंतजार अपनी बारी आने का, बाबा के स्वस्थ हो जाने का। आशिर्वाद प्राप्ति की लालसा में या किसी अदृश्य आत्म तृप्ति के लिए।
बीते रविवार चुन्नु भैया का रात्रि में फोन आया कि बाबा की तबीयत अचानक से अस्थिरता आ गई है। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। उनकी सांस उनकी जीवन की यात्रा को नाप रही है। उस यात्रा में सांस बार-बार थक जा रही है। बाबा बहुत आगे निकल जा रहे हैं और सांस का दम फूलने लग रहा है। हमारी प्रार्थना और डाक्टर का उपचार उन्हें उस दुनिया से खींचकर इस दुनिया में लाने का प्रयास कर रहे हैं। जहां हमारा इंतजार है, हमारी आशा है। हम अपने इच्छा से भरे अपूर्ण संसार में उनकी प्रतिक्षा कर रहे हैं। जहां उनके आते हीं हमारा खोखलापन थोड़ा भर जाएगा। जीवन थोड़ा और सुंदर हो जाएगा। मैं रात नींद के लिए रात से  लड़ता रहा और सुबह काम पर निकल गया। वहां मेरी उपस्थिति अनिवार्य थी लेकिन शाम होते तक मैंने अपने सिनियर को यह जानकारी दे दी कि मुझे कभी भी जाना पड़ सकता है। 

कहां? 

स्थान के जबाब में वह लखनऊ तो था। लेकिन ठीक-ठीक कहां पहुंचना है उसके लिए मेरे पास अब भी उत्तर नहीं है। 
क्यों के उत्तर में तो मैं पूरी तरह खाली हूं। 
बस मैं पहुंचना चाहता हूं। अगर गिद्ध के पास मानविय गुण होते शायद वह मेरी तरह होता। या मैं अपने मानवीय मूल्यों से लदा हुआ गिद्ध हूं। 
जो वहां पहुंचना चाहता था। कि अतीत के स्मृतियों का दरवाजा जब भी कोई भविष्य में खटखटाए तो उसके खुलते हीं मैं वहां मिलूं। 

"इस क्रूर सत्य के साथ कि मैं बाबा के स्वास्थ्य को बेहतर नहीं कर सकता, बस उन्हें असहाय सा देख सकता हूँ।"

पहली बार मैं उन्हें दूर से देखकर वापस लौट आया। खिड़की के दूसरी ओर से वो और भी कमजोर लग रहे थे। बीते सप्ताह में मानों उनकी देह तेजी से बूढ़ी होने लगी थी। 
जैसे उनका एक कदम चलना १०० कदम चलने के बराबर हो। और उन्हें इसका आभास हीं ना हुआ हो कि वह इतना आगे बढ़ चुके हैं। बहुत आगे जहां अस्पताल की शांति में मशीनों का शोर तड़प रहा है। जहां जीवन कृत्रिम मशीनों द्वारा संचालित हो रहा है। उनका वर्तमान समय बहुत संकिर्ण हो गया है जहां अब बहुत हीं महत्वपूर्ण चिजों को लेकर हीं आगे बढ़ा जा सकता है। उस संकरे वर्तमान में किसी का उनके स्वभाव को पूरा पकड़ पाना भी मुश्किल है। वहां सिर्फ कमजोर सांसे तैर सकती हैं और कुछ फूसफूसाहट भरे अधूरे शब्द सफर कर सकते हैं।
                 (पंडित निर्मल वर्मा जी की पुस्तक से)


मैं इतना साहस नहीं जुटा पाया कि उनके सम्मुख खड़ा हो सकूं। मैं अपने सजल आंखों के साथ उनके समक्ष नहीं जाना चाहता था, ना हीं मुझमें इतना साहस था कि मैं उनकी धुंधली चेतना में अपने होने का कंकड़ फेंककर कहूं कि, मैं हूं बाबा। 
मैं वापस बाहर आ गया। बरामदे की भीड़ को रात होने का अहसास धीरे-धीरे निगलते जा रहा था। 
जब मेरे आंसू के सभी निशान मिट गए थोड़ी देर के बाद पुनः अवधेश भैया से कहा कि भैया मैं मिलना चाहता हूं। उनकी अचेत को व्याकुल करने के लिए नहीं। स्वयं का परिचय दिए बगैर मैं वहां खड़ा होना चाहता था। 
काहे मिले नई क्या? गए तो थे? 

नहीं, मैं नहीं मिल पाया मुझे मिलना है। 
हम साथ गए। बाबा की आंखें आधी बंद थीं। मुझे देखते हीं उन्होंने पास बुलाने का इसारा करना आरंभ किया। मुझे लगा उन्हें कुछ तकलीफ है और मैं उनके हाथ को पकड़ने का प्रयास करने लगा। उन्होंने उसे छुड़ाते हुए और करीब बुलाया और पीठ पर हाथ फेरने लगे। फिर इसारे में पूछा खाना खाया की नहीं? 
और बताया कि मैं ठीक हूं। वह ऊर्जा असाधारण थी। उनका प्रेम शारिरिक अक्षमता को रौंदता हुआ मुझ तक पहुंच रहा था। कोई आधुनिक यंत्र उसे किसी पैमाने में नहीं समेट सकता। अपनी अस्वस्थता में भी मेरे स्वस्थ होने की लालसा से वो मुक्त नहीं हो पाए। उनका औदार्य होना उनके व्यवहार में झलक उठा। मेरे मास्क ना होने पर उन्होंने आपत्ति जताई,  उनके दाएं आंख के कोने में आंसू की एक बूंद अटकी हुई थी। 
लंबी चुप्पी, संवाद के इंतजार में तड़फड़ाती हुई हमारे बीच मर रही थी। मैंने उस चुप्पी के, मृत्यु से ठीक पहले बाबा से कहा आप ठीक हो जाएंगे बाबा। उनका सिर हिला और चुप्पी को थोड़ा जीवन मिला। उन्होंने संकेत किया सोनी को बुला दो।


मुंह में नलियां पड़े होने के कारण वो बोलने में असमर्थ हैं। अपनी सारी चैतन्यता के मध्य हवा का अवरोध उनके वर्तमान को कुतर रहा है। वो अपने संबंधियों को सचेत नहीं कर रहे आस्वस्त कर रहे हैं कि जीवन को ऐसे हीं जिया जाता है। जीवन के उस पार ऐसे हीं इत्मिनान और तसल्ली से पहुंचा जाता है। 

मानों जैसे कह रहे हों... ... तुम बहुत अच्छे लड़के हो। तुम्हें जीवन अच्छे से जीना चाहिए। 
इतना दुख देखने के बाद जीवन दूसरे तरीके से जीना चाहिए। 

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एक ठहरी हुई प्रार्थना

आज, जब वे अस्पताल के उस नीरस कमरे में लेटे हैं, तो दिल के किसी कोने में एक अजीब सी उदासी और कृतज्ञता एक साथ तैर रही है। वे उस पीढ़ी के आख़िरी कुछ पत्तों में से हैं, जिनकी छांव में बैठना मुझे सुरक्षित रखता था। ठीक-ठीक बरगद
आपका मुस्कुराता हुआ चेहरा, वह निश्छल वात्सल्य एवं गर्व और अनुशासन से सनी हुई अनुभव की वह महक जो आपके आस-पास हमेशा रहती है, जो कभी इत्र की सुंगध सी महसूस होती थी। अब वह जीवन का सुवासित कर रही है। मेरे लिए सबसे बड़ी पूँजी है।
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अंतिम प्रतिरोध 


            (गजल- रात ढ़लती नहीं दिन गुजरता नहीं)

उपचाराधीन अवस्था में अस्पताल में बीतते दिनों में मुँह में लगी नलियाँ शब्द छीन चुकी हैं, मशीनों के शोर ने बहुत से जरूरी शब्दों को निगल लिया है। तब बाबा अपनी जरूरतों को लिखकर बता रहे हैं। उन्होंने एक ग़ज़ल सुनने की इच्छा जताई है। 
कागज़ पर खिंची वे आड़ी-तिरछी, कांपती हुई रेखाएँ केवल अक्षर नहीं हैं। भारी संघर्ष और प्रतिरोध हैं। रात और दिन के मध्य तीरती एक थकती यात्रा।
                                  (वर्ष-2017)

जिस व्यक्ति ने जीवन भर विचारों और अनुभूतियों को सहजता से शब्द दिए हों, आज उसके लिए एक-एक अक्षर उकेरना किसी पहाड़ को लांघने जैसा था। 
बाबा को मैंने लंबे समय से प्रतिदिन डायरी लिखते देखा है। सुंदर अक्षरों से उनके आसपास का हर पन्ना सजा रहता था। आज कांपते हाथों से खींची गई वे रेखाएँ बता रही थीं कि देह भले ही जवाब दे रही हो, लेकिन भीतर अब भी कुछ चैतन्य है। 
                     (पन्नों पर अंतिम दिनों का संघर्ष)


मैं इन पन्नों को देखता हूँ तो मुझे लगता है कि यह उनकी लिखावट नहीं, बल्कि समय के पृष्ठ पर उकेरा गया उनका अंतिम प्रतिरोध है। एक ऐसा प्रतिरोध, जो बीमारी और अक्षमता के सामने घुटने टेकने से इनकार करता है। वे शब्द भले ही अक्षरों के रूप में धुंधला रहे हों, लेकिन उनकी अर्थ-ध्वनि बिल्कुल स्पष्ट है। अभी वहां आशा है.... जीवन भी।


अंतिम यात्रा 
                                   (वर्ष-2016)

"मैं ठीक हूँ।"
इस एक वाक्य के सहारे, किसी को भी एक लंबे समय तक निश्चिंत रखा जा सकता है।
पीड़ा में पगे इस छोटे से झूठ से, इंसान अपनों को अपने यथार्थ के ताप से बचाए रखता है।
मृत्यु की आशंका और उसके भयावह आगमन से, वह अपने तमाम आत्मीय जन को मुक्त कर देता है।
"मैं ठीक हूँ" का यह वर्तमान, हर बार मृत्यु की छाया को पीछे धकेलकर, जीवन की एक नई उम्मीद को रचता है।
और मृत्यु...
मृत्यु भी तो अंततः ऐसे ही आती है, जिसके हिस्से में केवल साँसों का मौन हो जाना लिखा है।
पर उस मौन को सहजता से स्वीकार पाना सबसे कठिन है...
क्योंकि ठीक उसी क्षण, "मैं ठीक हूँ" की स्मृतियाँ कानों में फुसफुसाने लगती हैं।
"मैं ठीक हूँ"... मृत्यु-पथ पर बढ़ा पहला कदम है।
जहां स्मृतियां वास्तविकता का सामना करने में लड़खड़ाती हैं।


दूसरी दुनिया में बस जाने वाले लोगों का सुख और दुख भला कहाँ रहता है?
                      (पुष्पांजलि अर्पित छाया चित्र)

मृत लोगों का सुख और दुख भला कहाँ रहता है?
​न वह किसी भूगोल का हिस्सा है, न ही हमारे वर्तमान का कोई अंश। वह तो अतीत का एक ऐसा यथार्थ है, जिसकी कल्पना कभी हमारे भविष्य के पवित्र क्षणों को रचती है, तो कभी हमारे वर्तमान को चुपचाप खरोंच देती है।
​वह रहता है हमारी जीवित स्मृतियों की धूल और धूप से काँपती दरारों में—जहाँ बीता हुआ कल (धूल) और आने वाला कल (धूप) एक-दूसरे का हाथ थामे शांत खड़े रहते हैं।
​और जब स्मृतियों को सहलाता कोई आँसू छलक पड़ता है, तो हम यह तय भी नहीं कर पाते कि यह सुख का आँसू है या दुख का।

​मृत लोगों का सुख और दुख हमारे आँसुओं में बसता है—जो समय के लंबे रास्ते पर सुबकता हुआ भी बचा रह जाता है। हमारे जीवित रहने तक उसका कुछ अंश हमारे भीतर यूँ ही छूटा रहता है।


               (पिछले वर्ष निजी विद्यालय पर १५ अगस्त                                       स्वतंत्रता दिवस समारोह की है।)

जब कोई व्यक्ति हमारे बीच से दूर जाता है, हमसे बिछड़ता है, तो वह केवल एक खालीपन छोड़कर नहीं जाता आंसूओं का खारा समुद्र हीं हमारे लिए नहीं छोड़ता। वह अपने पीछे अपने व्यक्तित्व के विस्तार जितनी जगह छोड़ जाता है। अपने गौरव, अपने विचार और अपने संघर्ष का पूरा स्थान छोड़ जाता है।
मेरा ऐसा मानना है कि जब कोई महान व्यक्तित्व हमारे जीवन या समाज के बीच से विदा लेता है, तो अपनी पूरी महानता, अपना सारा संघर्ष, अपनी पूरी चेतना और अपने विचार यहीं हमारे पास, इसी मिट्टी में छोड़कर जाता है।
मेरे बाबा, पूज्य (स्व.) श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी जी भी जब इस नश्वर संसार से विदा हुए, तो वह अपने पीछे अपनी स्मृतियों, संघर्षों और मूल्यों का एक ऐसा असीम विस्तार छोड़ गए हैं, जो हर क्षण हमारे भीतर उनके होने का अहसास कराता रहेगा और हमारे मार्ग को प्रकाशित करता रहेगा।


18 comments:

Mrinali said...

Bhut himmat chahiye hoti aisa kuch likhne k liye.
Q ki y kvl likhna hi nahi hai. Use nibhana bhi hai aur use poore samay pavitra rakhne ki jimmedari bhi hoti hai.
Umeed hai tu us p khara utrega.

Piyush Chaturvedi said...

Thanks Mrinali.
Mujhe lgta hai y meri phli zimmedari hai ki mai baba k liye km se km acchi soch rakhu.
Ya sabhi k liye acchi soch rakhu.

Deepak said...

मैंने अक्सर तुम्हें इनके बारे में बातें करना सुना है। और लिखते हुए भी।
बहुत कम लोग होते हैं जिनके बारे में हम लिखते हैं। ऐसे विचार रखते हैं।
मुझे लगता है इस परिस्थिति में कोई तो एक महान होता है। या तो लिखने वाला या फिर लिखने के लिए प्रेरणा देने वाला।

Piyush Chaturvedi said...

बाबा का शरीर बहुत तेजी से बड़ा हो रहा है।
उम्मीद है कि वो जल्द स्वस्थ हो जाएंगे।

Shivam said...

बहुत हीं सच्चा
सुंदर
और गंभीर लिखा है भाई आपने।

Piyush Chaturvedi said...

बहुत बहुत धन्यवाद भाई आपका।

Shakshi said...

सुंदर, साधारण और आकर्षक भी।
परमेश्वर दादा को स्वस्थ रखें।

Piyush Chaturvedi said...

धन्यवाद साक्षी।

Shiva jain said...

बाबा बहुत आगे निकल जा रहे हैं और सांस का दम फूलने लग रहा है..." – जीवन और अंतिम सांसों के इस फासले को इससे अधिक काव्यात्मक और क्रूर तरीके से नहीं लिखा जा सकता था।

Kavya said...

मैं अपने मानवीय मूल्यों से लदा हुआ गिद्ध हूं..
बहुत साहस चाहिए ऐसा लिखने के लिए। ईमानदारी भी।

Piyush Chaturvedi said...

धन्यवाद भाई।

Piyush Chaturvedi said...

मैं बहुत कुछ इकठ्ठा करने में लगा हूं काव्या।
स्मृतियों का रिसाव जब भी होगा मैं पुनः कुछ प्राप्त करूंगा।

Shakshi said...

लंबी चुप्पी, संवाद के इंतजार तड़फड़ाती हुई हमारे बीच मर रही थी। मैंने उस चुप्पी के, मृत्यु से ठीक पहले बाबा से कहा आप ठीक हो जाएंगे बाबा। उनका सिर हिला और चुप्पी को थोड़ा जीवन मिला।

*यह सारा कुछ हमेशा के लिए ऐसा हीं रहने वाला है।*

Piyush Chaturvedi said...

भविष्य के गर्भ को लेकर मैं निश्चित नहीं लेकिन अतीत के खंडहर में सदैव।

Deepak said...

दुख, पर बहुत हीं सुंदर कविता लिखी है आपने।

नीतेश said...

शत् शत् नमन। परमेश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें।

Deepak Tripathi said...
This comment has been removed by the author.
Deepak Tripathi said...

हर घटनाक्रम व स्मृतियों को इतने अच्छे से जीवंत करते हुए लिखा है जिससे हमें पढ़कर खुद के वहां होने का आभास महसूस हो रहा है। बाबा जी को विनम्र श्रद्धांजलि..🙏

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