तुमने आज केवल निशान छोड़े हैं।
निशान चोट के नहीं...
अपनी संवेदनहीनता के,
स्वयं की क्रूरता के,
और उस अनैतिक व्यवस्था के जिसमें संवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।
मौलिक अधिकारों को कुचलने के कुछ रंग छोड़े हैं तुमने हमारी देह पर।
आत्मा की चोट इससे अलग है।
उस चोट में तुम्हारी राजनीति का रंग नहीं है,
वहाँ संघर्ष का रंग है,
राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता की अपनी ज़िम्मेदारी है,
और घर वालों के सपनों का वह टुकड़ा है जिसने अब तक हमारे सब्र को सँभाल रखा था—
अपने स्वप्निल भविष्य की एक आस।
यह जो धैर्य टूटा है, वह तुम्हारे लंबे समय से फैलाए व्यवस्थित और सुनियोजित झूठ का परिणाम है।
और जो आक्रोश अब बह निकला है, उसे तुम्हारे इस सरकारी तंत्र और लाठियों का बाँध कभी रोक नहीं पाएगा।
वह और तेज़ बहेगा... तुम्हें बहा ले जाएगा,
तुम्हारी सत्ता को रसातल में डुबो देगा!
फिर तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी उन्हीं जन-मुद्दों की, जिन्हें सुनने से तुम्हारे कान कतराते हैं—
तुम, जो जनता की हर ज़रूरत और अधिकार को षड्यंत्र की दृष्टि से देखते हो।
ये महज़ चोटें नहीं हैं...
जैसे वोट का निशान अधिकार दर्शाता है,ये अधिकार माँगने के निशान हैं।
अंग अनिश्चित हैं,
पर रंग निश्चित है—लाल।
तुम्हें इस रंग से भय हो जाएगा!
तुम्हें जो कलम आज बन्दूक लग रही है तुम्हारे तोपों से कहीं बड़ी है।
तुम अब डरोगे लुभावने चुनावी नारे लिखने से।
तुम हटा देना इस रंग को किताबों से...
तुम्हारी सत्ता के लिए यह सरल है, और संभव भी।
असंभव है तो बस तुम्हारे लिए—जनता को 'जनता' समझना।
तुम फांसी तक रूके रहो।
तुम फांसी तक खाते रहो।
तुम फांसी तक चुप रहो।
तुमने स्वयं को गांधी का अनुयाई बताया है.. सत्याग्रह का पालन किया है।
तुम गोड़से के आने तक खाते पीते रहो।
भजन गा सको तो वो भी गाओ.. शायद वो जल्दी पहुंचे।
तुम्हें इस अन्न के बाद गोली खानी है।
तुम्हें फांसी चढ़ना है।
तुम अभी से बौखला गए?
1 comment:
तुम्हारे लिए यह सरल है और संभव भी। 😂😂😂😂
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