सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Saturday, July 18, 2026

तुम्हें इस रंग से भय हो जाएगा- पीयूष चतुर्वेदी

तुमने आज केवल निशान छोड़े हैं।
निशान चोट के नहीं...
अपनी संवेदनहीनता के,
स्वयं की क्रूरता के,
और उस अनैतिक व्यवस्था के जिसमें संवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।
मौलिक अधिकारों को कुचलने के कुछ रंग छोड़े हैं तुमने हमारी देह पर।

आत्मा की चोट इससे अलग है।
उस चोट में तुम्हारी राजनीति का रंग नहीं है,
वहाँ संघर्ष का रंग है,
राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता की अपनी ज़िम्मेदारी है,
और घर वालों के सपनों का वह टुकड़ा है जिसने अब तक हमारे सब्र को सँभाल रखा था—
अपने स्वप्निल भविष्य की एक आस।

यह जो धैर्य टूटा है, वह तुम्हारे लंबे समय से फैलाए व्यवस्थित और सुनियोजित झूठ का परिणाम है।
और जो आक्रोश अब बह निकला है, उसे तुम्हारे इस सरकारी तंत्र और लाठियों का बाँध कभी रोक नहीं पाएगा।
वह और तेज़ बहेगा... तुम्हें बहा ले जाएगा,
तुम्हारी सत्ता को रसातल में डुबो देगा!
फिर तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी उन्हीं जन-मुद्दों की, जिन्हें सुनने से तुम्हारे कान कतराते हैं—
तुम, जो जनता की हर ज़रूरत और अधिकार को षड्यंत्र की दृष्टि से देखते हो।

ये महज़ चोटें नहीं हैं...
जैसे वोट का निशान अधिकार दर्शाता है,ये अधिकार माँगने के निशान हैं।
अंग अनिश्चित हैं,
पर रंग निश्चित है—लाल।
तुम्हें इस रंग से भय हो जाएगा!
तुम्हें जो कलम आज बन्दूक लग रही है तुम्हारे तोपों से कहीं बड़ी है।
तुम अब डरोगे लुभावने चुनावी नारे लिखने से।
तुम हटा देना इस रंग को किताबों से...
तुम्हारी सत्ता के लिए यह सरल है, और संभव भी।
असंभव है तो बस तुम्हारे लिए—जनता को 'जनता' समझना।





तुम परेशान हुए बैठे हो कि यह निरंकुश और अमानवीय सरकार है। जहां व्यक्ति के मौलिकताओं का पतन हो रहा है। अरे! अब बात भारत की नहीं रही। अब बात विश्वगुरु की हो गई है। जिस देश की वित्त मंत्री महंगाई के सवाल पर यह कहे कि मैं लहसुन प्याज नहीं खाती। परिवहन मंत्री कहे मैं पेट्रोल वाली गाड़ी में नहीं चलाता। पर्यावरण मंत्री कह बैठे किसी रोज कि मैं आक्सीजन नहीं लेता। वहां तुम शिक्षामंत्री के पिछे खाना छोड़कर पड़े हुए हो। किताब की इतनी बड़ी-बड़ी बातें और मानवीय मूल्य याद हैं। अपनी जीजिविषा का स्मरण है। अपने शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पगलाए हुए हो। भविष्य की कामना लिए चायवाले को उंगली दिखा रहे हो। लेकिन यह भूल गए कि विश्वगुरु देश के प्रधान सेवक शिरोमणि नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने कहा था कि किसी को भूख से नहीं मरने दूंगा। अब तुम कहो कि यह भी तो कहा था का ना खाऊंगा ना खाने दूंगा? हां, तो भैया नवरात्रि में वो नहीं खाए और २० दिन से तुम। और वो भी अपनी मर्जी से। उन्होंने तो तुम्हें रोका भी नहीं। कोई गरीब भूखा नहीं मरेगा.. और आप तो सफल व्यक्ति हो भैया, इसी क्रम में उन्होंने देश में मुफ्त राशन भी बाटे। 80 करोड़ गरीब जनता का पेट भरा। फिर तुम्हें उठाकर खाना ठूसवाने ले गए तो तुम्हारे पेट दर्द कर रहे हैं? तुम्हीं तो भगत सिंह की तस्वीरें लहरा रहे थे प्रदर्शन के दौरान। उनकी भी भूख-हड़ताल जबरजस्ती तोड़ी गई थी। उन्हें भारत देश में फांसी दिया गया था। 
तुम फांसी तक रूके रहो। 
तुम फांसी तक खाते रहो। 
तुम फांसी तक चुप रहो। 
तुमने स्वयं को गांधी का अनुयाई बताया है.. सत्याग्रह का पालन किया है। 
तुम गोड़से के आने तक खाते पीते रहो। 
भजन गा सको तो वो भी गाओ.. शायद वो जल्दी पहुंचे। 
तुम्हें इस अन्न के बाद गोली खानी है। 
तुम्हें फांसी चढ़ना है। 
तुम अभी से बौखला गए?

1 comment:

Shubham said...

तुम्हारे लिए यह सरल है और संभव भी। 😂😂😂😂

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