ठहरा हुआ समय और धूप-छाँव सी स्मृतियाँ: एक निष्काम कर्मयोगी का जीवन-वृत्त
हम जब भी पीछे मुड़कर देखते हैं, तो इतिहास हमें केवल तारीखों और बड़े-बड़े मंचों से दी गई गर्जनाओं में याद नहीं आता। वह याद आता है कुछ बेहद शांत चेहरों की आभा में, कुछ ठहरी हुई आत्मीय मुस्कुराहटों में, और एक ऐसे त्याग में जिसने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा।
बाबा—यानी जय प्रकाश चतुर्वेदी जी।जब वे अस्पताल के उस बेजान और उजले कमरे में उपचाराधीन थे—जहाँ दीवारों पर जीवन की जीवंतता के बजाय केवल टूटती साँसों का सूनापन था और मशीनों की एक अनवरत, एकरस ध्वनि गूँज रही थी—तब सोनभद्र की पहाड़ियों से लेकर लखनऊ के पुराने, धूल भरे रास्तों तक फैले उनके 79 वर्षों के जीवन की स्मृतियाँ एक-एक करके आँखों के सामने से गुज़रने लगती थीं। ऐसा लगता था मानो समय की किसी पुरानी किताब के पन्ने हवा से स्वयं पलट रहे हों। वहाँ आप केवल बैठकर देख नहीं सकते थे; स्मृतियों के उस प्रवाह में आपको निरंतर साथ चलना होता था।
अयोध्या की गलियाँ और वो सत्तर का दशक
उनके पूज्य पिता रामआधार चतुर्वेदी जी के संस्कारों की वह कैसी निर्मल छाँव रही होगी, जिसने अपने बेटे को एक ऐसे मार्ग पर जाने दिया जहाँ केवल अनिश्चितता और कठिन साधना थी। 1962 की चीनी आक्रमण की धुंध के बीच संघ की शाखा से शुरू हुआ यह सफर 'प्रचारक' की कठिन, नीरव पगडंडियों पर आगे बढ़ता गया। फैज़ाबाद और अयोध्या की तंग गलियाँ, जहाँ सुबह की धूप भी विलंब से पहुँचती थी, वहाँ बाबा ने संघ के प्रचारक के रूप में अपनी युवावस्था का सबसे स्वर्णिम हिस्सा खामोशी से समर्पित कर दिया। गृहस्थ जीवन, प्रेम और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पीछे छोड़कर वे राष्ट्र-सेवा के मार्ग पर अग्रसर हो गए।
वे केवल संगठन का विस्तार नहीं कर रहे थे; वे 'विद्या भारती' के माध्यम से उन बच्चों की आँखों में भविष्य के स्वप्न बो रहे थे। निर्धनता, निरक्षरता और अभावों से जूझती जनता के लिए उन्होंने सुलभ शिक्षा और पुस्तकों की व्यवस्था की।
राजनीतिक कोलाहल में शांत 'सारथी': लखनऊ का दौर
समय का पहिया आगे बढ़ा और आया वर्ष 1992। देश एक नए दौर से गुज़र रहा था। बाबा को भारतीय जनता पार्टी के संगठन का दायित्व सौंपकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों में भेजा गया। काशी और गोरखपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में—जहाँ राजनीति का तापमान हमेशा ऊँचा रहता था, गोरखपुर में बाहुबल की चुनौतियाँ थीं तो काशी में प्रशासनिक व सांगठनिक संघर्ष—ऐसी तपिश के बीच भी बाबा एक ठंडी और शीतल छाँव की तरह कार्य करते रहे।अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ उनके संबंधों को केवल 'राजनीतिक' कहना उस प्रगाढ़ आत्मीयता का संकोच होगा। जब लखनऊ की गलियों में चुनावी कोलाहल अपने चरम पर होता, तब उस कोलाहल के पीछे बंद कमरे में अटल जी के साथ बैठकर सबसे जटिल सांगठनिक चक्रव्यूह को सादगी से सुलझाने वाले 'सारथी' बाबा ही थे। दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद था, जो बिना बोले सब कुछ कह जाता था।
इसी प्रकार कल्याण सिंह जी का वह प्रसंग स्मरणीय है। सोनभद्र की पथरीली माटी पर जब एक पारिवारिक मांगलिक अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री आए, तो बाबा ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने केवल अपनी माटी के लोगों की पीड़ा और आवश्यकताएँ कल्याण सिंह जी के समक्ष रख दीं। विदाई के समय कल्याण सिंह जी ने मुस्कुराते हुए स्नेहस्वरूप क्षेत्र को एक 'पुल' की सौगात दे दी। यह राजनीति नहीं, बल्कि एक निष्काम साधक के प्रति सत्ता का वह आदर था जो आज के युग में विरले ही देखने को मिलता है। कलराज मिश्र जी भी उनकी सांगठनिक सौम्यता और विलक्षण सूझबूझ के सदैव प्रशंसक रहे।
गुप्ता धाम की सीढ़ियाँ: जन-सेवा ही प्रभु-सेवा
2004 से 2010 के मध्य जब वे विधान परिषद (MLC) के सदस्य रहे, तब भी वे लखनऊ के सचिवालयों की चमक-धमक से दूर सोनभद्र के चांची कला की माटी के बीच अधिक दिखाई दिए। गाँव में वर्ष 2003 में भव्य माँ दुर्गा एवं बजरंगबली मंदिर का निर्माण कराया तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रंगमंच के माध्यम से ग्रामीणों को जोड़कर उनके मनोरंजन को एक दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान की।
चांची कला की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित 'गुप्ता धाम' (गुप्तेश्वर महादेव) का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए एक अत्यंत कठिन परीक्षा जैसा था। बाबा ने वहाँ पक्की सीढ़ियों का निर्माण करवाया और पेयजल की समुचित व्यवस्था कराई। आज जब भी कोई वयोवृद्ध या बालक उन सीढ़ियों का सहारा लेकर बाबा गुप्तेश्वर के दरबार में पहुँचता है, तो वह अनजाने में ही बाबा के उस मौन संकल्प और तपस्या को नमन कर रहा होता है।वे केवल उत्तर प्रदेश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहे। जब भी संगठन को आवश्यकता पड़ी, वे अपना झोला उठाकर झारखंड और मध्य प्रदेश की अनजानी पगडंडियों पर निकल पड़े। उनके लिए न कोई सीमा थी, न कोई पराया।
महाप्रयाण और अंतिम श्रद्धांजलि
समय का चक्र अंततः उस मोड़ पर आ पहुँचा जहाँ भौतिक उपस्थिति स्मृतियों में बदलने लगती है। 25 जुलाई को रात्रि 10:55 बजे बाबा ने अपनी अंतिम साँस ली और जीवन की इस लंबी यात्रा को विश्राम देकर अनत के मार्ग पर प्रस्थान कर गए। उनके देवलोकगमन के समाचार के साथ ही संपूर्ण संगठन और राजनीतिक परिवेश में शोक की लहर दौड़ गई। 26 जुलाई की प्रातः उत्तर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में उनके अंतिम दर्शन का आयोजन किया गया, जहाँ पार्टी कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ राजनेताओं, समाजसेवियों और उनके स्नेही जन-समुदाय ने नम आँखों से अपने इस जनप्रिय, निष्काम कर्मयोगी को श्रद्धासुमन अर्पित किए। विभिन्न समाचार पत्रों और राजनैतिक मंचों पर उनके विचार, सरलता और दशकों की राष्ट्र-सेवा को आदरपूर्वक याद किया गया।तत्पश्चात, उनके गृह जनपद सोनभद्र के उनके प्रिय ग्राम चांची कलां में पूर्ण राष्ट्रीय सम्मान (राजकीय सम्मान) के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। जिस मिट्टी को उन्होंने जीवन भर सींचा, जिस माटी के लोगों के कल्याण के लिए वे सदैव समर्पित रहे, अंततः वे उसी चांची कलां की माटी में विलीन हो गए।
संक्षिप्त जीवन परिचय
नाम- जय प्रकाश चतुर्वेदी
पुत्र- स्व. राम आधार चतुर्वेदी
जन्म तिथि-14 अक्टूबर 1946
मृत्यु तिथि - 25 जुलाई 2026 रात्रि 10:55:11
आयु- 79 वर्ष
शिक्षा- एम. ए. (प्रो) अर्थशास्त्र
संघ शिक्षा- वर्ष 1962 से स्वयं सेवक- तृतिय वर्ष प्रशिक्षित।
प्रचारक- 1972 से नगर,जिला,विभाग प्रचारक साथ हीं विद्या भारती पूर्वी क्षेत्र प्रमुख।
भारतीय जनता पार्टी में योजन-
. वर्ष 1992 से उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रों के संगठन मंत्री।
. 2003 में प्रचारक जिवन से निवृत्त,भाजपा संगठन मंत्री पद से भी।
. काशी, गोरखपुर क्षेत्र प्रभारी।
. प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, राष्ट्रीय परिषद सदस्य।
. वर्ष 2004-2010 उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य।
. पार्टी के निर्देशों पर उत्तर प्रदेश के सभी चुनाव में सक्रिय भूमिका।
. झारखंड, मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की योजना से पूर्व समय देकर कार्य किया।
6 comments:
सुंदर चित्रण
धन्यवाद
Yh ek yug ka ant hai.
शत् शत् नमन।
तुम्हारे समेटे हुए स्मृतियों ने इन्हें अमिट कर दिया।
इस प्रकार का संघर्ष और विचार आज के समय में देखने को नहीं मिलता।
सामाजिक जीवन आज के दौर में केवल लाभान्वित होने का साधन मात्र बन कर रह गया है।
बचपन में कनहर नदी पार करने में कितना संघर्ष करना पड़ता था और बाढ़ आने पर कैसे दुद्धी तरफ से घूमकर शक्तिनगर जाना पड़ता था वो दिन पूरी तरह याद है। आज सोनभद्र के सुदूर क्षेत्रों में बुनियादी विकास लाने व इसे पहचान दिलाने में भी बाबा जी का काफी योगदान है। आज चांचीकलां गांव में इतना विकास हुआ है उसका एकमात्र श्रेय इनको जाना चाहिए। बाबा जी संघ के मा० प्रचारक भी रहे आज एक संघ कार्यकर्ता मैं उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि एवं नमन करता हूं..🙏
Post a Comment