जून की उस उबलती धूप में भी मैं न जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहता था। और दिसंबर की उस छितराई, कमज़ोर धूप में थकान का बोझ लिए शाम ढलते ही सो जाया करता। पर सर्द रातों के बाद जब भोर जवान होती, मैं अचानक पास पिताजी को पाता।
उनकी देह से एक मीठी गंध बहती थी—ऐसी गंध जिसे चखा नहीं जा सकता, पर जो किसी बहुत परिश्रम और सब्र से पकाए गए भोजन की तरह मन को तृप्त कर दे। उसकी महक से एक लालची संतोष पेट को आधा भर देता... पर मेरी भूख का बाकी आधा हिस्सा हमेशा ख़ाली ही रहा।
मेरे बचपन के दिनों में पिताजी इतने जवान और विशाल थे कि मैं उनके साये में कभी ठीक से बड़ा हो ही नहीं पाया। मैं हमेशा 'छोटू' ही रहा—अंत तक। उनके सुख में, नहीं- नहीं... उनके संघर्ष में, उनके दुख में। उनकी देह से फूटती हर उस पीड़ा में, जो करवट बदलते ही शरीर के किसी दूसरे कोने से फिर उभर आती थी।
और उस असह्य पीड़ा को सहते हुए भी, उन्होंने मेरा नाम पुकारा था।
अगर गर्मी की छुट्टियों और जाड़े की ठिठुरन को आपस में जोड़ूँ, तो स्मृतियों के केवल तीन साल ही चुरा पाता हूँ। समय की सबसे छोटी इकाई में नापूँ, तो ये बरस शायद चंद महीनों में सिमट जाएँ। शायद यही वजह है कि अब मैं जीवन में हर छोटी से छोटी चीज़ को सहेजने लगा हूँ।
क्या कुछ और भी गिनना बाकी रह गया है?
या इन बीते बरसों के खोल में ही सब कुछ उलझकर रह गया है? किसी कमज़ोर जाले जैसा, जिसे कोई छिपकली किसी रोज़ अपने साथ बुहार ले जाएगी...
और जब मैं स्मृतियों का यह जूठन लेकर ईश्वर की ओर देखता हूँ, जो मंदिर में शांत और निरीह आँखों से मुझे ताकता रहता है ,तब भीतर एक थका हुआ वैराग्य जन्म लेता है। उस पत्थर के भगवान के आगे मेरे पिताजी कहीं अधिक जीवंत और विशाल नज़र आते हैं, और ईश्वर का वह मौन... यथार्थ की इस दुधिया मुस्कान के सामने बेहद बौना और कमज़ोर लगने लगता है।
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