बचपन के दिन याद आते हैं। नदी में उफान आते ही जीवन जैसे अचानक अव्यस्थित जाता था। मेरा जन्म तो गांव की आरंभिक विकास के बाद हुआ। जब सड़कों पर साइकिल से चलना संभव था। पैदल थोड़ा और सहज। लेकिन बड़े इस समस्या का वर्णन अक्सर अपने स्मृतियों में करते हैं। जब बैलगाड़ी और घोड़ा सबसे सुलभ और सुरक्षित साधन हुआ करते थे। नाव ही उस पार जाने का इकलौता जरिया हुआ करती थी और फिर नदी के दूसरे छोर पर पहुँचकर तेलगुड़वा के लिए कमांडर का सहारा लेना होता था। जो भीड़ से ठसाठस भरी हुई हुआ करती थी। संकट भरा रास्ता सिर्फ नदी पार करने पर खत्म नहीं होता था।
जब जलस्तर सीमा लांघ जाता, तो रास्ता बदल जाता था दुद्धी और हाथिनाला के टेढ़े-मेढ़े, लंबे मार्गों से होकर मुख्य मार्ग तक पहुँचना पड़ता था। यह जद्दोजहद केवल गाँव तक सीमित नहीं थी, कई बार बाढ़ का पानी सीधे घर के आँगनों तक दस्तक दे देता था। अपने हीं गांव में लोगों ने पलायन को बार-बार जीया। बाढ़ का उफनता पानी हर वर्ष घरों में पहुंचता…..फिर एक समय की उब के बाद सभी घर मकान में तब्दील हुए। सभी ने ऊंचाई पर पुनः मकान निर्माण कराया जो अब स्थाई घर का स्वरूप ले रहा है।
वे ऊँच-खाल भरे रास्ते कभी इतने सहज नहीं थे कि हर उम्र या हर स्थिति का इंसान उन पर आसानी से कदम बढ़ा सके। अभावों और कठिन भौगोलिक रास्तों के उस दौर में, बाबा ने सबसे पहले सड़कों की महत्ता को समझा। एक पुल की सोच ने उसी संघर्ष के बीच जन्म लिया था। दूर-दूर तक फैले उस अंचल में जब पीने योग्य पानी के सीमित जल स्रोत थे, तब उन्होंने बुनियादी ज़रूरतों को प्राथमिकता दी और लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
विकास और लोक-कल्याण का यह बीज रायबरेली में सरकारी विभाग में कार्यरत बाबा स्वर्गीय गिरीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने बोया था, लेकिन उस विचार रूपी पौधे की निस्वार्थ सेवा और सींचने का काम पूज्य स्वर्गीय जय प्रकाश चतुर्वेदी जी ने अपने अनवरत तप से किया।
आज जब उस पुल को देखते हैं, तो स्पष्ट महसूस होता है कि कनहर पर बना यह पुल केवल कंक्रीट और सीमेंट का ढांचा मात्र नहीं है। यह लोक-कल्याण के लिए एक कर्मयोगी के जीवन भर के तप का प्रतिफल है। स्वर्गीय चतुर्वेदी जी के भागीरथी प्रयासों और तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय (स्व.) कल्याण सिंह जी की संवेदनशीलता से निर्मित यह पुल इस पूरे अंचल की जीवंत धड़कन है।
इस पुल का नामकरण 'श्री जय प्रकाश चतुर्वेदी स्मृति सेतु' किया जाना केवल एक नाम बदलना नहीं होगा, बल्कि इस माटी के प्रति उनके निस्वार्थ समर्पण, दूरदर्शी सोच और संघर्ष को हमारी ओर से एक सच्ची और विनम्र श्रद्धांजलि होगी।
क्षेत्र के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों, माननीय भूपेश चौबे जी एवं राज्यमंत्री माननीय संजीव गौड़ जी से इस अंचल की जनभावनाओं का यही नम्र आग्रह है कि वे निष्काम कर्मयोगी स्वर्गीय चतुर्वेदी जी के इस ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देते हुए इस पुण्य कार्य को मूर्त रूप प्रदान करें। ताकि कनहर की लहरों के साथ-साथ यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनकर जीवित रहे।
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