ये जो दुख के क्षण हैं, वह ठीक-ठीक जीवन को दोबारा बाबा की उस देह की अनुपस्थिति में जीना है। जिसमें इत्र की सुंगध थी। कपड़ों का सूघरपन और चेहरे पर अनुपम मुस्कान,आंखों में चंचलता। मस्तिष्क में अलौकिक आभा।
वर्तमान में फैला यह काला अंधेरा हमारे आँसुओं द्वारा धुलता जाएगा। मैं जानता हूं आँखों का धुंधलापन और यह झिल्लीनुमा दृष्टि लंबा समय लेगी इस अंधेरे को काटने के लिए। या शायद यह सदैव नुकिली बनी रहे। पिताजी की मृत्यु की तरह चुभती रहे।
लेकिन शांतिपूर्ण भविष्य की कल्पना में सिर्फ स्मृतियों का प्रकाश ही है जो हमें और रुलाएगा, और आँखों की झिल्ली साफ होती जाएगी। फिर हमें आभास होगा कि बाबा अपने पीछे कितना सुंदर संसार छोड़ गए है।
बाबा से जुड़ी सारी भौतिकता हमारे सामने उपस्थित है, और उनकी सारी सूक्ष्मता हमारे भीतर।
उनके कपड़े, उनकी घड़ियाँ, उनकी लेखनी से भरी डायरियाँ... वे तमाम कतरनें जो कभी कहीं अधूरेपन का वर्तमान लिए आज भी जिंदा हैं।
कितना कुछ रह गया है हमारे बीच, और उससे भी ज्यादा हमारे भीतर।
अमरता को जीवंत करता दूसरी दुनिया में पहुँचा व्यक्ति, हमारे साथ उसी समय हमारी दुनिया में भी जीवित रहता है। हर व्यक्ति दुनिया में बसी तमाम दुनियाओं में एक साथ जिंदा रह सकता है। व्यक्ति सदैव जीवित रहता है जब तक कोई उसे पूरी तरह भूल न जाए।
और मेरे लिए बाबा की ऐसी अनुपस्थिति या उन्हें भूल जाने की कल्पना करना भी एक त्रासदी जैसा है।
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