मैं अपना सब कुछ एक कमरे में व्यवस्थित कर खुद को व्यस्त रखता हूं—इतना व्यस्त कि खुद से बाहर न निकल सकूं। अपने में समेटा, सिर्फ अपने काम से काम रखने वाला। अपनी सोच को या तो सादे पन्नों पर बिछाने लगता हूं, या सोच भरी आंखों को आईने में देखते हुए आंसुओं को बहने देता हूं। आज मैंने अपने आंसुओं को शब्द दिए; आंसू पन्नों पर स्याही की जगह खर्च कर दिए।

वैसे तो घर जाना कम ही होता है, लेकिन घर पर वक्त गुजारना एक आशीर्वाद सा लगता है। एक अजीब सी खुशी होती है—जैसे तितली को फूल का रस मिल गया हो। वहां सब कुछ है, जिसे मैं आंखों से देख सकता हूं, त्वचा से महसूस कर सकता हूं। पेड़ों की सरसराहट से लेकर पत्थरों की ठोकर तक में पिताजी के दर्शन पाता हूं। हवाएं पिताजी का संदेश लेकर आती हैं और ठोकरें ज्ञान देकर जाती हैं।
9 वर्ष पहले जब उनका देहांत हुआ, तब वो मुझमें बहुत गहराई तक बचे हुए थे। उस समय सभी ने उनकी यादों को बराबर-बराबर बांट लिया था—मैं, भैया, बाबा, आजी, घर वाले और रिश्तेदार। सबका मन भारी था। समय बीतता गया और वो सभी के भीतर थोड़े कम होते गए, पर समाप्त नहीं हुए। सभी ने उन्हें अपने भीतर थोड़ा-थोड़ा सहेज कर रखा है। सभी के पास उनसे जुड़ी कोई न कोई खास याद है, जिसकी चर्चा होती रहती है।
लेकिन मां... जब भी मां को देखता हूं, तो उनमें उन्हें पूरा पाता हूं। जितना उन्होंने विवाह के बाद उन्हें पाया था और फिर बीते सालों में साथ बिताए हर क्षण में—उन्हें मां के रूप में पूरा ही पाता हूं।
मेरी हर उम्र की पिताजी से जुड़ी जो यादें बिसर गई थीं, वो ताजा हो जाती हैं।
कुछ सालों तक मैं सोचता रहा कि पिताजी के जाने के बाद सब समाप्त हो जाएगा—उनके द्वारा बनाई सारी चीजें भी। पर देखा कि वो सारे पेड़ अब भी मुस्कुरा रहे हैं, मकान अब भी अपनी बाहें फैलाए खड़ा है। हमारे आंसू भी घर की नींव को कमजोर नहीं कर सके। कुछ पौधे जरूर सूखे, पर मालूम पड़ा कि उन्हें दीमक चाट गई थी, उनका पिताजी के जाने से कोई संबंध नहीं था। सारी भौतिक चीजें वैसी ही थीं, यहां तक कि मैं भी। मैं गलत था।
फिर सब रोते गए, सबने अपना गम हल्का किया और काम के बोझ के आगे घुटने टेक दिए। सभी में पिताजी का होना बस थोड़ा-थोड़ा बच गया। पर मां... मां के बहते आंसुओं ने उन्हें कम नहीं होने दिया। आंखों के नीचे पड़े काले घेरों में मानो पिताजी ने अपना घर बना लिया हो। हर बात में उनकी यादें साथ रहने लगीं। पहले लगता था कि यह अस्वस्थता है जो मां को बीमार कर देगी, पर नहीं... यह प्रेम में बीते वर्षों की स्मृतियां जो बार-बार कुछ ढूंढ रहीं थीं। आंखों के नीचे के घेरे, गालों पर तैरते आंसू, सादा वेश-भूषा, गालों की गहरी झुर्रियां और सफेद होते बाल—इन सभी में पिताजी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
ऐसा नहीं कि घर की दीवारों पर उनकी तस्वीर नहीं है, या मैं उनका चित्र अपने पास नहीं रखता। पर उन तस्वीरों को देखने के बाद भी भीतर कहीं एक तलाश जारी रहती है। मां को देखने के बाद वो तलाश पूरी हो जाती है। मैं पिताजी को मां के साथ बूढ़ा होते देखता हूं। जहां सब कुछ अपनी उम्र के अगले पड़ाव में जाने की दौड़ में लगा है, वहीं यादें अब भी जवान हैं। मैं जानता हूं ये यादें अंतिम सांस तक जवान रहेंगी और पिताजी उनमें हर वक्त पूरे रहेंगे।
सच कहूं तो मुझमें उनका 'थोड़ा होना' मां को देखने के बाद 'पूरा होने' जैसा हो जाता है। मैं अपनी आंखों के नीचे के काले घेरों को और गहरा होता महसूस करता हूं। घर छोड़ते वक्त उन्हें पूरी तरह खो देने का डर हमेशा मेरे भीतर बना रहता है—और इस डर को मैं कभी समाप्त नहीं होने देना चाहता। मैं सदैव पिताजी को स्वयं में पूरा पाना चाहता हूं... उतना ही, जितना वो अंतिम समय में मुझमें थे।
वहां लौटने के लिए।
जहां अब सब कुछ अधूरा है।
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