वो सफेद हाफ टी-शर्ट में हास्पिटल के बेड पर पीठ के बल लेटे हुए थे। आंखों का चश्मा थकान के कारण थोड़ा निचे सरक आया था। गालों पर सफेद दाढ़ी उनकी अलसाई हुई झुर्रियों से बाहर झांक रहीं थीं। जो मेरे स्मृतियों में कहीं अंकित नहीं था। मैंने बाबा को सदैव सुसज्जित और सुदर्शन अवस्था में पाया है।
मैं उनके पास पहुंचा और चेहरे के पास थोड़ा झुककर कहा.. बाबा आज आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं।
कल से आप बहुत बेहतर हैं। और सोडियम भी अच्छी जगह पहुंच रहा है। (बाबा को आई.सी.यू. में सोडियम की कमी के कारण भर्ती किया गया है।)
थोड़ा मुस्कुराते हुए, (जो उनके स्वस्थ चेहरे पर हमेशा विद्यमान रहती है) उन्होंने कहा, तोहरो चेहरा आज ठीक लगत बा। कल लग रहा था कि जैसे थकान बहुत ज्यादा हो गई है तुम्हें।
मैं अभी विश्राम करके आ रहा हूं। अच्छी नींद ली है मैंने।
बाबा ने थोड़ा और मजबूत मुस्कान अपने चेहरे पर लाने का प्रयास किया और मैं उनके बाल सहलाने लगा। (वर्तमान में वो हर छोटे परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।)
उन्होंने मुझे अपनी गोल बड़ी और सजल नेत्रों से देखते हुए पूछा, कंघी कहां बा हमार? उनकी आंखों में मैं तैर रहा था। मैं उस पवित्रता में तैरता हुआ उनसे झूठ नहीं बोलना चाहता था। थोड़ा अलग हटकर , ठीक उस दूरी से जहां से वो मेरी धीमी आवाज को सुन सकें, मैंने कहा बाबा आपके बाल ऐसे हीं सजे हुए लगते हैं। अभी ये व्यवस्थित हैं।
यह झूठ था। बाबा के बाल के संबंध में नहीं। कंघी के संबंध में।
जबसे उन्होंने अपने स्वास्थ्य में हल्का सुधार पाया है वो अपने नैसर्गिकता के बहुत समीप पहुंचना चाहते हैं।
उम्र और अस्वस्थता के जालों को तोड़ते हुए वो उस जीवन को छूना चाहते हैं जो वह जीते आए थे। लेकिन हर छोटी इच्छा को उनका क्षीण होता स्वास्थ्य निगल लेता। जाले तक पहुंचते हाथों को कभी तेज खांसी, कफ का कोई मलवा या सांसों से उनकी लड़ाई पीछे खींच लेती। इन सभी को हरा वो वहां पहुंच भी जाते तो दस्त उन्हें बहुत पिछे ढकेल देता। भोजन की मात्रा बहुत कम हो गई है। पीड़ा उनके होंठों पर नृत्य कर रही है। कंपकंपाती हथेलियां अपने सारे दैनिक कार्य स्वयं से करने का साहस बटोर रही हैं।
फिर भी उनकी सहनशीलता और धैर्य के समक्ष ये सब बौने नजर आ रहे थे। लेकिन हम उनके द्वारा निर्देशित चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में रखते। और उनकी इच्छाओं को आई.सी.यू और हास्पिटल के पैमाने पर परखते हुए प्रेषित करते।
कभी-कभी इसका झुंझलाहट उनके चेहरे पर साफ नजर आता। उनके व्यवहार में हल्का रूखापन झलकने लगता।
"क्या लगता है आपको,आप लोग बहुत अनुभवी हो गए हैं? कुछ बोली ला तो सुने के चाही न।
आप लेकर के चिजों को आइए। जो मेरे आवश्यकता की होंगी उन्हें मैं उपयोग करूंगा। या वो रखी रहेंगी।"
उनकी आवाज उतनी स्पष्ट नहीं थी जितनी वो सदैव हुआ करती हैं। थकान मिश्रित आवाज बहुत धीमी मगर तीखी थी। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर आए असहजता को भांपते में देर नहीं लगाई।
ऐसा मत सोचिह कि बाबा डाटत बड़न। बाबा बीमार हैं। हम तोहरा बहुत मानी ला।
फिर अचानक से बच्चों जैसी निष्छल मुस्कान अपने गालों पर प्रकट हुई जिसने उनकी सारी झुर्रियों को धुल दिया था। देख बाबा हंस देलन चल्ल...
मैंने पहले कभी उन्हें इतना साधारण और निहत्था नहीं पाया था। मानों जैसे उन्होंने अपने सारे इच्छाओं का एक पल में समर्पण कर दिया हो।
मैंने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया, अरे! नहीं बाबा ऐसा कुछ नईखे। आप आराम करिए। जो थोड़ा कुछ भी शरीर समेट रहा है आप बोलकर या गुस्सा करके सब खर्च कर दे रहे हैं। आप सोइए।
ऐसे हीं हंसत रहल कईली।
पिताजी के याद हऊ?
मैं शायद इस अचानक आए प्रश्न के लिए तैयार नहीं था। भीतर कुछ टूटा, पर स्वयं को रोकते हुए भी मेरी जीभ से कुचले हुए वाक्यों के कुछ शब्द बाहर आ ही गए— "हां बाबा..." और फिर मैं मौन हो गया।
पिताजी का जिक्र होते ही मानो मैं भीतर तक पवित्र हो जाता हूं, और वही पवित्र जल आंखों के कोरों में इकट्ठा होने लगता है। मैंने किसी तरह स्वयं को संभाला।
हम उनका नाई बचा पईली।
बहुत प्रयास किया मैं। बहुत हीं संतोषी और ईमानदार व्यक्ति था। मेरे बहुत से फैसलों पर कभी उसने शिकायत नहीं किया। वो भी हंसत रहत रहन।
तु आराम कर् बाबा, वो कराहते हुए पिछे सरक रहे थे। मैं उन्हें सहारा दे रहा था।
क्या बाबा के सामर्थ्य में था पिताजी को बचा पाना?
नहीं, प्रारब्ध और नियती तमाम तकनीकी और चिकित्सीय शक्तियों से बड़ी होता हैं। लेकिन यह भी सच है कि हमने अपने जीवन के किसी भी संकट की घड़ी में सबसे पहले बाबा की ओर ही देखा है। मनुष्य कुछ ही पलों या क्षणों के लिए ही सही, किसी न किसी का 'ईश्वर' हुआ करता है। मनुष्य के भीतर के श्रेष्ठतम का प्रकाश पुंज ही तो उसे भगवान बनाता है—वह प्रकाश, जो सामने वाले के अंधकारमय जीवन में रोशनी बिखेर दे। यह दैवीय प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है, और मैंने समय-समय पर बाबा के भीतर इस प्रकाश को सबसे प्रखर रूप में देखा है। उसी प्रकाश से आलोकित होते हुए मैंने अपनों को और स्वयं को बढ़ते देखा है।
उनके संपन्न, सुसज्जित और गौरवान्वित वर्तमान से सभी थोड़ा टुकड़ा रखना चाहते थे। शायद यह हमारा आलस्य हो सकता है। जहां हम सदैव उनके प्रति इच्छित हीं रहे। कभी यह नहीं सोचा की उनकी हमसे क्या उम्मीद हो सकती है। अपनी नाकामयाबी से लेकर विपन्न वर्तमान के लिए हमारे प्रश्न उन्हें भेदते रहे। कहीं यहीं उनके मानसिक दुख का कारण तो नहीं?
मैं सदैव अपने लुलुपता भरे जीवन से उन्हें दूर रखने का प्रयास किया। अपनी इच्छाओं को उनके सहारे से पृथक रखने का प्रयास।
हम जिससे प्रेम करते हैं उसके प्रति सम्मान स्वयं अपना स्थान बना लेता है। बाबा मेरे जीवन में उसी बरगद के भांति हैं जिसकी जड़ों से धवल श्रद्धा फूटती है। सुविचारों का जन्म होता है। जहां प्रेम के बदले प्रेम की इच्छा जन्म नहीं लेती। बदले की भावना नहीं भटकती। कुछ मिलने की उम्मीद में थोड़ा और देने का क्रम आगे बढ़ाया जा सकता है।
शायद इसीलिए, इस विशाल बरगद के सामने मैंने अपने जीवन में एक 'गिलहरी' होना चुना है—जो अपने छोटे-छोटे प्रयासों से इस सेतु को बांधे रखना चाहती है।
बाबा अक्सर पूछा करते थे चार धाम कौन-कौन से हैं? चार वर्ण, चार आश्रम?
मुझे वो सारे उत्तर आज भी याद हैं।
वो प्रश्न क्यों पूछे गए थे इसका मर्म अब समझ आता है। वो सेवा और त्याग और समर्पण के बीज थे।
रोशन के अंदर भी बहुत सेवा भाव है।
हां बाबा, लेकिन वो भी अपने स्वास्थ्य से चिंतित हैं।
उन्हें ठीक से नींद नहीं आ रही थी। कभी थकान, कभी घबराहट तो कभी कोई स्मृति उनके नींद में दखल दे रही थी।
क्या हुआ बाबा?
बहुत आवाज आ रही है मशीनों की। उन्होंने बीते कुछ दिनों से अच्छी नींद ली थी।
बीते सोमवार जब वो व्यायाम करने के लिए के.जी.एम.यू में आए थे तो अचानक से उनकी तबीयत बिगड़ गई। जिस कारण उन्हें तत्काल भर्ती करना पड़ा।
रात के १० बजे के आसपास जब मैं उनसे मिलने भीतर गया तो दादा वहीं उनके समीप खड़े थे। नाक में आक्सीजन सपोर्ट के लिए नाजल कैनुला और बीपी मापने का कफ लगा हुआ था। ऊपर ऑसिलोस्कोप मॉनिटर में हरी रेखाएं तैर रहीं थीं।
छोटू आया है, कानपुर से।
बाबा पूरी तरह अचेत नहीं थे। मुझे देखते हीं शब्द उनके कांपते होंठों पर फड़फड़ाने लगे लेकिन बाहर कूदते उससे पहले वो मृत होकर होंठों के किनारे पर एकत्रित हुए जा रहे थे।
मैं कुछ बोल नहीं पाया और बाहर आ गया।
मैं अभी भी फूआ के साथ बाहर बरामदे में बैठा हूं। उसके छटपटाते हुए सवालों पर संतोष और संवेदना के थके हुए टुकड़े फेंके रहा था। लंबी यात्रा करके मेरे जबाब भी कमजोर हो चुके हैं। वहीं बातें मैं बार-बार दुहराने लगा हूं। जैसे बाबा अपनी रोज की मौलिक चाहना बार-बार दुहरा रहे हैं।
अब हम निकलब फूआ।
बाबा से मिल ले।
पता नहीं,
मैं अपनी आत्मिक दरिद्रता और यह लाचारी बाबा को नहीं दिखाना चाहता था। लेकिन समाज में जीते हुए जिस सामाजिक प्रतिष्ठा को उन्होंने कमाया है, उसने उन्हें वह दिव्य दृष्टि प्रदान की है जिससे वे बिना कहे हर किसी की परिस्थिति और मजबूरी को भांप लेते हैं। वे हमेशा बातचीत में उतना खाली स्थान छोड़ देते हैं, जहां से सामने वाला आत्मसम्मान के साथ चुपके से निकल सके।
उन्होंने चश्मे को ठीक करने का प्रयास करते हुए कहा, "ठीक बा जा, हमार इ चश्मा थोड़ा ढीला हो गईल बा। चौराहे पर ABC चश्मा वाला है, वहां पर ये थोड़ा ठीक करावे के लिए किसी से बोल दीह।"
और रात में भोजन के साथ एक छोटा सा टुकड़ा लाल पेड़ा के भेज दीह। वो आर्या जी लेकर आए हैं। बहुत स्वादिष्ट होता है। बनारस का लाल पेड़ा।
जी, लेकिन वो थोड़ा कठोर है बाबा।
वो आप उसकी छोटी-छोटी लड्डू जैसा बना देंगे तो वह अच्छा हो जाएगा खाने लायक।
जी बाबा, और मैं अपनी स्वार्थी आत्म-तृप्ति की भटकन में वहां से निकल पड़ा। ग्लानि, पश्चाताप और बेसब्री के आंसुओं से भीगा हुआ मैं... जो उस वक्त खुद को पूरी दुनिया से छुपा लेना चाहता था।
3 comments:
Bhut himmat chahiye hoti aisa kuch likhne k liye.
Q ki y kvl likhna hi nahi hai. Use nibhana bhi hai aur use poore samay pavitra rakhne ki jimmedari bhi hoti hai.
Umeed hai tu us p khara utrega.
Thanks Mrinali.
Mujhe lgta hai y meri phli zimmedari hai ki mai baba k liye km se km acchi soch rakhu.
Ya sabhi k liye acchi soch rakhu.
मैंने अक्सर तुम्हें इनके बारे में बातें करना सुना है। और लिखते हुए भी।
बहुत कम लोग होते हैं जिनके बारे में हम लिखते हैं। ऐसे विचार रखते हैं।
मुझे लगता है इस परिस्थिति में कोई तो एक महान होता है। या तो लिखने वाला या फिर लिखने के लिए प्रेरणा देने वाला।
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