मेरा सारा जीया हुआ अतीत अब भी मुझमें उतना ही व्यापक है जितना मुझमें मेरी श्वास। कभी-कभी लगता है अतीत वह पेड़ है जिससे मैं सांस ले रहा हूं। क्योंकि हर रात जब मेरा अतीत सो रहा होता है मेरा दम घुटता है। इसलिए हर रोज वर्तमान के दरवाजे पर खड़े होकर मैं अतीत की खिड़की में झांकता हूं। जहां मेरी सांसे तेज, लंबी और गहरी होती हैं।
सफरनामा
- Piyush Chaturvedi
- Kanpur, Uttar Pradesh , India
- मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।
Friday, March 4, 2022
बाबा की लकीरें
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।
Monday, February 22, 2021
श्रद्धा
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।
Friday, June 5, 2020
"बाबा की लकीरें"
बीतते समय के साथ मैंने बाबा में कुछ खास परिवर्तन नहीं पाया। उनकी कलम और माथे के बाल, जो पहले सफेदी के बीच हल्के काले हुआ करते थे, अब पूरी तरह अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। और सफेद से आगे जाना अब उनके बस में नहीं।
पर कुछ दिन पहले मिलने पर मैंने पाया कि सेवा करते वक्त जो लकीरें उनके हाथों में दिखा करती थीं, वे अब वहाँ धुंधली पड़ती जा रही हैं। उन्होंने अपना स्थान बदल लिया है; उन लकीरों को मैंने उनके चेहरे के आसपास कमजोर होती मांसपेशियों में देखा। होंठों पर मुस्कुराहट होने के बावजूद मैंने उनके मस्तिष्क पर एक अजीब-सा बल महसूस किया—जैसे होंठों का एक उल्टा प्रतिबिंब उनके माथे पर बन गया हो।
आँखों में चमक आज भी वैसी ही है, पर मानो बदलते वक्त के आधुनिक आविष्कारों के बीच उनकी चमक थोड़ी चिंतित-सी है। मैंने हमेशा उन्हें एक टूटते तारे की तरह महसूस किया है, जिससे हर कोई अपनी उम्मीदें बांधता है। मैंने सभी के भीतर एक आस देखी है और उस उम्मीद को वास्तविकता का रूप लेते भी देखा है।
मेरी हमेशा से यही धारणा रही कि बाबा पानी और धूप की तरह हैं—जिनकी कमी और अधिकता दोनों कष्टदायक होती हैं, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा सत्य रूप में ही अपनाया है। उस मीठे जल के समान, जिससे सदैव मेरी प्यास बुझती आई है; और सुबह की पहली धूप के समान, जो पूरे शरीर को ऊर्जा से भर देती है। उनका होना एक ऐसे आशीर्वाद जैसा है जो प्रेरणा से भर देता है।
जब से मेरी सोच अस्तित्व में आई है, मैंने उनकी कल्पना उस महल की तरह की है जिसकी नींव में पूरा परिवार अपने जीवन को एक दिशा देने में सक्षम हुआ। आज भी महल के हर एक कोने पर उनकी उतनी ही नज़र है। अब ढलती उम्र को देखकर मैंने पाया कि नींव आज भी मजबूती प्रदान कर रही है, लेकिन छत मानो कमजोर होने लगी है।
अब भी मैंने उन्हें अपनी लकीरों से लड़ते देखा है, पर हर बार उस लड़ाई में लकीरें जीतती जा रही हैं और धीरे-धीरे पूरे शरीर पर अपना घर बना रही हैं। मैंने अंतिम बार उन लकीरों को उनके शरीर से हटाकर हाथों पर वापस लाने का प्रयास किया था, पर असफल रहा। मैंने अक्सर उनसे उनके वृद्ध होने की बात कही, पर लगता है उनकी नज़र हाथों की उन लकीरों पर चली जाती होगी जिन्हें वे हर रोज़ देखते हैं और जो उन्हें हमेशा वैसी ही नज़र आती हैं। वहीं, मैं उन्हें बहुत दिनों बाद देखता हूँ, इसलिए मुझे वे कम नज़र आती हैं। यह सब नज़र का ही तो असर है—सब अपने-अपने नजरिए से देखते हैं।
लेकिन यह लिखना, उसे देखने जितना आसान नहीं था।
फिर कभी, सामने दीवारों पर लगी तस्वीरों को—जो बचपन से आज तक घर की शोभा बढ़ाती आ रही हैं—जब मैंने हाथ से साफ करने की कोशिश की, तब मुझे अपनी लकीरें नज़र आनी बंद हो गईं और मैंने लिखना शुरू किया। लिखते वक्त मेरी नज़र हर बार मेरी अपनी लकीरों पर चली जाती थी, मानो मैं अपनी ही लकीरों को शब्द दे रहा हूँ। तभी अचानक तस्वीरों के पीछे से गुजरती छिपकलियों को देखकर लगा मानो वे दीवारों पर एक अजीब-सी लकीर खींच रही हों, और मैं दीवार को एकटक देखने लग जाता। मैं रुक जाता, लगता जैसे सारी लकीरें बिखर गई हैं, और मैं फिर उन्हें समेटने में लग जाता।
इन सभी लकीरों के मध्य सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि बाबा का त्याग और सेवा किसी बलिदान से कम नहीं। उन लकीरों ने खुद को खोने से पहले बहुत कुछ पाया है। कम होती इन लकीरों को आज भी समाप्त होने का डर नहीं है। बची हुई कुछ लकीरों को मिलाकर अगर किसी शब्द का रूप दिया जाए, तो वह 'सेवा' ही होगा।
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।
Thursday, April 16, 2020
कुआं
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।
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