सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Sunday, May 3, 2020

झूठ

एक झूठ है जो सच के चौराहे खड़ा है। लोगों से मिलते अपना झूठ बांट रहा है। बड़ी लंबी कतार है उसके आगे। एक सच है जो झूठ के गलियारों में चक्कर लगा रहा है। उसे अपनाने वाला, सुनने वाला कोई नहीं। तो कहीं दोनों साथ मिलकर इक्छा के मकान में आराम फरमा रहे हैं।                                      -पीयूष चतुर्वेदी                  Https://itspc1.blogspot.com

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