सफरनामा

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Kanpur, Uttar Pradesh , India
मुझे पता है गांव कभी शहर नहीं हो सकता और शहर कभी गांव। गांव को शहर बनाने के लिए लोगों को गांव की हत्या करनी पड़ेगी और शहर को गांव बनाने के लिए शहर को इंसानों की हत्या। मुझे अक्सर लगता है मैं बचपन में गांव को मारकर शहर में बसा था। और शहर मुझे मारे इससे पहले मैं भोर की पहली ट्रेन पकड़ बूढ़ा हुआ गांव में वापिस बस जाउंगा।

Monday, February 1, 2021

देश और सत्ता

अब वो समय है जहां जनता के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। आपातकाल की बात बात कर जनता को डराने बनाने वाले लोग धड़ल्ले से जनता का शोषण कर रहे हैं। सीमित अवधि की आपातकालीन युग से निकला भारत प्रतिदिन उस स्थिति में सिसक रहा है। पत्रकारिता जगह के बड़े चेहरे अपने महत्व को भूल सरकार की गोद में पल रहे हैं। जिम्मेदारियों का नकाब पहन देश में जहर घोल रहें हैं। जनता  उस जहरीली हवा में सांस ले रही है। सच्चे पत्रकारों की कलम से स्याही उड़ेली जा रही है। नामी पत्रकारों ने अपनी ईमानदारी वाली कलम तोड़ दी है। अखबारों में विज्ञापनों का कब्जा है। वो सरकारी, सोने की कलम से सरकार की स्याह सच्चाई को छुपा रहे हैं। खिलाफ बोलना जेल जाने का रास्ता साफ करता है। बड़े-बड़े न्यूज नेटवर्क खबर की जगह जनता में द्वेष पहुंचा रहे हैं। जिसे निरंकुशता पर अंकुश लगाना था वो भी भक्त बन बैठे। जमीन पर अपने अस्तित्व को तलाशती खबरें वाट्सएप पर झूठ की तरह दौड़ रही है। उस दौड़ में शामिल लोग झूठ को और वृहद स्तर पर फैला रहे हैं। हर झूठ को सच के करीब लाने की अधर्मी लड़ाई लड़ रहा है। जनता के छोटे-बडे़ अधिकारियों को, सांस लेने से करवट बदलने तक को.. संस्कृति, सभ्यता, धर्म निति, देशभक्ति आदि के समकक्ष लाया जा रहा है। कुछ वाट्सेपिया भक्त कहते हैं यह नए भारत के निर्माण करने की प्रथम सिढ़ी है। मैं मानता हूं यह सनक की ऐसी सोच है जो देश में मिडिया का ग़लत इस्तेमाल कर, सोसल मीडिया को झूठ से सजाकर लागू किया जा रहा है। जहां एक ऐसी सोच पनप रही है जिसे सत्ता चाहिए देश नहीं।
-पीयूष चतुर्वेदी

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