जीवन का चुनाव हमारे लिए एक घटना मात्र है।
सत्य मृत्यु है। और जन्म सत्य पर चलने, भटकने , बिदकने , संवरने, बिगड़ने का मार्ग।
मृत्यु को हम जीते हैं। उसे चुनते हैं। हमारा क्रियाशील रहना जीवन को चुटकुले सुनाने जैसा है। जिन्हें सुनकर हंसते हुए जीवन को हम सत्य के साथ खड़ा करते हैं। अच्छे मृत्यु की कल्पना हीं हमें अच्छा जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है।
मैं तब तक जीना चाहता हूं जब तक मृत्यु को नहीं चुन लेता। ठीक मृत्यु से पहले मैं समर्पण करना चाहता हूं। समर्पण उस मार्ग का जिस पर मैं चलता आया था। अपनी गलतियों का समर्पण।
मैं भटकना चाहता हूं। तब तक जब तक मैं सत्य को प्राप्त नहीं कर लेता।
सत्य अच्छाई की पगडंडी पर रेंगता वह शख्स है जो अकेला चलता जा रहा है।
उसने बोला...
उसने कहा..
उसने देखा..
उससे पूछो..
जैसे किस्सों में अपने को रखना चाहता हूं। उस रखे हुए में अपनी जबाबदेही तय करना चाहता हूं।
चुप नहीं रहना चाहता।
चुप्पी अक्सर हमें मनुष्यता से दूर फेंक देती है। आत्म सम्मान का ढींढ़ोरा पीटने वाले को अक्सर चुप रहते देखा।
हंसने से मुस्कुराते फिर चुप होने तक के समय में चुप होना मृत्यु है। अधरों का समर्पण भी मृत्यु है। बुरा न देखो
बुरा न बोलो
बुरा न सुनो
के तर्क में बुराई के खिलाफ बोलने की मनाही नहीं थी बुरा बोलने की मना थी।
शायद इसमें भी गांधी का कोई दोष हो।
मैं बोलना चाहता हूं। जब तक मेरा मुस्कुराना शांत नहीं हो जाता।
मैं जीना चाहता हूं जब तक सामने बैठा चुप सा व्यक्ति कुछ बोल नहीं पड़ता। जो उसे बोलना था।
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