तुम थे भी नहीं।
रहोगे भी नहीं।
न मेरे समर्थन में,
न पूर्णतया मेरे विरोध में।
तुम निश्छल रहे?
पता नहीं।
लेकिन तुम रहोगे
अपने अधूरे वादों में,
कुछ स्वार्थी फैसलों में,
झूठे एकांत में—
उस साए की तरह जो रोशनी में भी साथ छोड़ जाए।
किसी सूखी नदी की गर्म रेत की तरह,
सूखती पेड़ों की चटकती टहनियों की तरह,
दरार खाती चट्टानों की तरह। जहां तुम्हारी व्याकुलता छटपटा रही है।
तुम रहोगे मेरी स्मृतियों में किसी बेजबाब प्रश्न की तरह—
कि तुम कब रहे?
मेरे समर्थन में?
मेरे विरोध में?
मेरे साथ या कहीं दूर ही सही?
तुम कब रहे जब तुम्हें रहना था... ?
और तुम रहे... जाने कैसे? बस थोड़ा संभले रहे।
अस्तित्व और उपस्थिति के खोखले मानक मात्र बनकर... बस रहे।
तुम इतने निरूत्तर और निराधार क्यों रहे?
बिल्कुल गूंगे। कि तुमसे....
ह
हा
ही
हि
हू
हु... कुछ नहीं बोला गया।
मानो जैसे सबके रहे, लेकिन इतनी बंजरता लिए कि कोई पुष्प ना खिले।
बस रहे... बने रहे।
दुर्गंध देते बहाने और सड़ती हुई हिम्मत के साथ।
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